जागो साक्षर प्यारे – ब्रजभाषा व्यंग्य

कहाँ चलौ घुटरू, बैठ, या बीजरा में कहाँ जाय रह्यौ है? नैंक चित्त कों चैन परन दै! तू कहै तौ तेरे लिएं नींबू निचोर कें सिकंजी बनाय देंउ और तू कहै तौ आमी कौ पनों बनाय देंउ! बैठ कहूँ जा मत या भूभरिया में।

ठीक है बत्तो, बैठों। वैसें मैं घाट किनारें ही जाय रह्यौ हुतो। याद है पहलें कैसे मजा आते। वा आग उगलती गरमी में हू ठण्डी  हवा  कभूकभार तौ बदन कों टच कर ही लेउ करती। अब तौ का बजार और का गली, सब जगें ए-सी और कूलर’न के ही राज हैं। पुरानी गली’न के वेंटीलेशन तौ सपने है गये। चल तू आमी कौ पनों ही पिबाय दै।
 
सब समय कौ खेल है घुटरू, काहू जमाने में खस की टटिया’न के मजा रहे अब तौ ए-सी में हू सरीर चिपचिपौ सौ रहौ करै है। न वैसी हवा है न वैसे पानी, न वे लोग न वे बातें! अब तौ बस जो है, जैसें है, ठीक है! अपनी-अपनी पारी खेलौ और चलौ। कछू अच्छौ नाँय लगै अब।
 
बत्तो, बचपन में सुनों करते कि जब साक्षरता बढ़ जायगी तौ सबरी समस्या’न के समाधान चुटकी’न में हैवे लगंगे। मगर सीन तौ कछू और ही बन कें आयौ है। या सों तौ निरक्षर बढ़िया हुते जो पर्यावरण सों सच्चऊँ प्रेम करौ करते। आज के जमाने के साक्षर’न कों तौ जैसें कछू सूझ ही नाँय रह्यौ। जा साखा पै बैठे हैं वा ही कों काटें जाय रहे हैं।
 
हाँ घुटरू आज कौ इन्सान ऐसौ ही हैकेंसर के विरुद्ध लड़ाई लड़ रह्यौ है और प्लास्टिक की बोतल’न में पानी पी रह्यौ है।  हाथ’न सों बारूद के सौदा कर रह्यौ है और म्होंड़े सों शान्ति के सन्देस दै रह्यौ है। यै जो बरस’न सों वातावरण में बारूद घुरें जाय रही है या के असर सों कैसें बच सकें हम सब? रोज विध्वंस करने हैं रोज निर्माण करने हैं! बावरे हू या के आगें सियाने लगें! मगर कहें कौन ते भैया? लै तू आमी कौ पनों पी।
 
अरे यै कैसौ स्वाद है पने कौ बत्तो? बड़ौ ही अजीब सौ स्वाद है, आमी में गड़बड़ है, पानी में या मसाले में? वौ पहले जैसौ स्वाद है ही नाँय!
 
घुटरू, एक में नाँय, सब में गड़बड़ है और यै सबरी गड़बड़ अपने सामनें ही तौ भयी है, जो है सो पी लै!
 
मेरे ही सामने बिगड़ा है सब कुछ
युगों से मैं फकत सोता रहा क्या
 
नवीन सी चतुर्वेदी

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