चेंटी चेंटा पार्टी – ब्रजभाषा व्यंग्य

 आउ भेंन बत्तो, का खबर लायी?

 घुटरू आजकल तौ एक ही खबर है चारों तरफ। कॉकरोच पार्टी वारी खबर। या खबर पै ही पूरौ जोबन छायौ भयौ है आजकल। खबर स्टेज पै ठुमका लगाय रही है और कोउ तबला बजाय रह्यौ है, कोउ बीन बजाय रह्यौ है, कोउ तान रह्यौ है, कोउ पूर रह्यौ है, कोउ रिकॉर्डिंग कर रह्यौ है, कोउ लाइव दिखाय रह्यौ है, कोउ मूँगफरी बेच रह्यौ है तौ कोउ भीड़ में पॉकेट साफ कर रह्यौ है।

तमासा हक्कू बक्कू का – ब्रजभाषा व्यंग्य

 घुटरू यै कैसौ हो-हल्ला है रह्यौ है? इतनों सोर? बालक’न के इंताम हैं, विनें पढ़ाई-लिखाई करनी है, ये लड़वे वारे’न कों कछू सूझै है कि नाँय? त्यौहार’न पै तौ सबके सब बालक’न की पढ़ाई-लिखाई और मरीज’न की बिमारि’न कौ पीटनों पीटते रहें! या समें काहु भलेमानुस की समझ में नाँय आय रही? सबके सब घोड़ा बेच कें सोय गये हैं का?

बहक गयी बत्तो – ब्रजभाषा व्यंग्य

 आउ भेंन बत्तो, बैठ, और बताय का खबर लायी है?

 खबर कोउ लायवे की चीज है? खबर तौ बनायवे की चीज है। खबर फैलायवे की चीज है। रायते की तरें।

चौबीस घंटा मिकी माउस – ब्रजभाषा व्यंग्य

 घुटरू भैया, बड़े दिनन बाद दरसन दिये! कहाँ जाय मरौ हो मरे?

अरे कहूँ नाँय बत्तो, और कहाँ जामंगो? चुनाव है रहे हुते, सो नैंक मोदी जी के संग बिजी हुतो! का कही, तू और मोदी जी!

आँखमारू बट्टा – ब्रजभाषा व्यंग्य

कछू कहौ साब नॉस्टेल्जिया तौ नॉस्टेल्जिया है। याके जैसौ आनन्द और कहूँ नाँय। ऐसौ हम या मारें कह रहे हैं कि आज हमें नॉस्टेल्जिया पै बात करनी है। जब याके विरुद्ध बोलनों होयगौ तब अलग्ग राग अलापंगे। ऐसें ही तौ होवै है। 

मिस ऐतराज - ब्रजभाषा व्यंग्य

 ऊपर वारे नें सबकों कछू न कछू बिसेस क्वालिटी के संग बनायौ है। जहाँ कछू लोग अकबर-बीरबल जैसे लगें हैं वहीं कछू लोग साक्षात नारद मुनि कौ अवतार दिखाई परें हैं। कछू’न कों देख कें लगै कि पिछले जनम में ये जरूर ही मुनीम साब रहे होमंगे तौ कछू’न कों देख कें लगै है कि इन कौ तौ जनम ही बकालत करवे के लिएं भयौ है।

ट्रम्प की सनक कौ इलाज - ब्रजभाषा व्यंग्य

चौपाल पै चर्चा चल रही हुती कि ट्रम्प नें सबकी नाक में दम कर रखी है. का इत्ती बड़ी दुनिया में एक हु ऐसौ बीर बाँकौ नाँय नें जो या ट्रम्प की सनक कौ इलाज कर सकै? हमनें कही यामें कौन सी बड़ी बात है, ट्रम्प की सनक कौ इलाज तौ एक दिना में ही है सकै.

बड़ी खबर – ब्रजभाषा व्यंग्य

 “तुम किसी भी पन्थ का कर लो चयन। आजकल हर मार्ग पर व्यवधान है।“ सच्ची भैया सबेरे कौ टैम होय कि संजा कौ बखत, सहर की काऊ भी सड़क पै निकर जाउ, कुम्भ की भीड़ जैसौ नजारौ देखवे कों मिलै।

सूर्यास्त हो गया – ब्रजभाषा व्यंग्य

 एक अप्रैल को सबेरें सबेरें मोबाइल पै मैसेज आयौ कि लॉकडाउन लगवे वारौ है। मैसेज खोल कें देखौ तौ अन्दर लाल लाल अक्षर’न में लिखौ भयौ हुतो ‘अप्रैल फूल’। पढ़ कें चेहरा पै स्माइल तैर गयी और बचपन की अनेक’न कहानी याद आय गयीं। एक कहानी शेयर करों।

कवि जी कविता सुनाओ कविता – ब्रजभाषा व्यंग्य

 अब का बतामें साब, कछू बरस पहले की बात है, एक सज्जन कों जब पतौ चलौ कि हम कवि हैं तौ बोलौ “कवि जी कुछ सुनाओ”. हम हू नये नये मुल्ला बने भये हुते, सो भैया एकदम जोस में भर कें बोले

चला मुरारी हीरो बनने – ब्रजभाषा व्यंग्य

देखौ साब, फिर मत कहियो कि बतायी नाँय नीं। स्पष्ट शब्द’न में कह रहे हैं। काहु सों डरें थोरें ही हैं। खलकत में यानी चौरे में कह रहे हैं। एक जैसे चेहरा मोहरा वारे लोग होमें नाँय नें का। बात यै है कि यै अमेरिका वारे ट्रम्प की कहानी नाँय नें।

युद्ध है कबूल बातचीत मानते नहीं – ब्रजभाषा व्यंग्य

 बचपन सों अबतक अनेक बार सुनों कि दुनिया में सात अजूबे हैं! सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड! मगर जो सब सों बड़ौ अजूबौ है वौ तौ या लिस्ट में है ही नाँय! आप ही बताऔ, आदमी सों बढकें और कोऊ अजूबौ भयौ है? न भयौ है, न होयगौ! दावे सों कह रह्यौ हों! कोऊ देखौ होय तौ बताऔ!

पीयूसी सर्टिफिकेट – ब्रजभाषा व्यंग्य

  जैसें ही गाड़ी निकारी सामनें मुंसीपाल्टी की गाड़ी और वाके संग भौत सारे लोग दिखाई परे! हमनें सोची, नाली-नाले’न में भौत गन्दगी भरी परी है, सायद वाकों साफ करवे आये होंगे! फिर सोची अभी तौ बरसात भौत दूर है, इत्ती जल्दी काम थोरें ही करौ जावै! असुविधा फैलवे के बाद सुविधा दैवे कों सुसासन कह्यौ जावै है! नाँय-नाँय ये गन्दगी साफ करवे नाँय आये हैं! तौ क्यों आये हैं?

बुद्धि कौ सदुपयोग – ब्रजभाषा व्यंग्य

 सही कहें कि एक जनम में सात जनम है जामें हैं! एक जीवन में हजार अनुभव है जामें हैं! याद आमें पुराने दिन, कैसी तल्लीनता सों अखबार पढ़े जाते! पन्ना बाँट-बाँट कें पढ़े जाते! खबर’न पै चर्चा होतीं! अब तौ यै हालत है कि “बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ ग’इ है रफ्तार। पाँच मिनट में पढ़ लेते हैं दस पन्नों वाला अखबार।।“

ट्रम्प है कि ट्रम्पनी – ब्रजभाषा व्यंग्य

 सनी देओल की पिक्चर कौ वौ डायलॉग है नें तारीख पै तारीख, तारीख पै तारीख, तारीख पै तारीख! ऐसें ही यै दारी कौ ट्रम्प हू टैरीफ पै टैरीफ, टैरीफ पै टैरीफ, टैरीफ पै टैरीफ चिल्लातौ रहै। भाइयो बहनो, आप नें वौ फिल्मी गीत तौ सुनों ही होयगौ – “झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो, मैं मैके चली जाऊँगी, तू देखता रहियो!”

वैलेंटाइन स्पेशल, जहाँ न पहुँचै रवि – ब्रजभाषा व्यंग्य

 घुटरू भैया, कल हमारे मुहल्ला में दो घटना घटीं! पहली तौ यै कि हमारे यहाँ वेलेंटाइन ईवेंट हुतो सो एक कवि जी कों बुलायौ, बिचारे आये हू मगर एक तौ कहूँ सों फ्री की चढ़ायें भये, दूसरें अमावस्या की रात और तापै गटर कौ ढक्कन खुल्यौ भयौ; सो भैया घुटरू, जहाँ न पहुँचै रवि, वहाँ पहुँच गये कवि!

जैसे हम वैसे हमारे नेता – ब्रजभाषा व्यंग्य

 बड़े छल्ले-पट्टे करवामन लगौ है घुटरू! हेयरडाई, फेसियल और जानें कहा-कहा करवामन लगौ है!

मंदी चालू आहे – ब्रजभाषा व्यंग्य

 घुटरू एक बात तौ बताय यै जो लोग कहते रहें कि भौत महँगाई है, भौत मंदी है तौ सच्चऊँ ऐसौ है या लोग बस बहाने ही ढूँढते रहें?

ब्रजभाषा व्यंग्य – बड्डी वारी मोटर कौ पानी

बत्तो जमना जी नहाय आयी लगै?

       नाँय घुटरू, अब तौ घर में ही नहाय कें जाओं! हाँ चौमासे में जमना नाहयवे कौ आनन्द अवश्य लेंउ, बाकी दिन’न में तौ अपने घर की नल भली?

ब्रजभाषा व्यंग्य - बन्दर-बाँट

 ुटरू आज तौ सब जगें चुनावी चर्चा चल रही हैं और तू है जो किताब लै कें बैठौ भयौ है! का पढ़ रयौ है?

ब्रजभाषा व्यंग्य – शुभचिन्तक

तुम का समझे बरसाती नालौ है यह

ब्रजभाषा रत्नाकर सागर जैसी है

ब्रजभाषा व्यंग्य – जागो मोहन प्यारे जागो

 बत्तो सोवै कि जागै?

 घुटरू दिन के सात बजे रहे हैं, यै कोउ सोयवे कौ टैम है जो पूछ रह्यौ है सोवै कि जागै?

ब्रजभाषा व्यंग्य – डज गॉड एक्जिस्ट

 घुटरू एक बात तौ बताय!

 पूछ बत्तो!

ब्रजभाषा व्यंग्य – जो डर गया सो मर गया

 बत्तो याद है बचपन में साईंबाबा, काली माई, भैरोंबाबा आदि-आदि नामन ते पर्चा बँटते। कभू-कभू बस-अड्डे ताँगे-अड्डे या रेलवेस्टेशन पै हु पर्चा बाँटे जाते। याद आई तोय?

ब्रजभाषा व्यंग्य – सॉरी है कि सत्तनरायन कौ प्रसाद

 एक बात तौ कहनी परैगी घुटरू अंग्रेज’न नें हमें ऐसे-ऐसे सब्द दिये हैं कि बस पूछौ ही मतजैसें सॉरी कों ही लै लै। बीच बजार में आदमी की पाग उतार देउ और जस्ट सॉरी कह कें घर की घटिया चढ़ जाउ। काऊ अच्छे-भले आदमी की गाड़ी ठोक देउ और कन्धा उचकाते भए सॉरी बोल कें पतरी गली सों निकल्लेउ।

ब्रजभाषा व्यंग्य – मानवाधिकार, ट्रैफिक और कबीर कौ साँचौ

 घुटरू आजकल के लोग’न कों है का गयौ है? इनके अधिकार तौ इन्हें पतौ हैं परन्तु जैसें ही कर्तव्य की बात करौ तौ बगल झाँकते भए घर की घटिया चढ जामें! इन्हें का मिलनों चैंयें यै बतायवे वारे तौ भौतेरे हैं मगर इन्हें करनों का चैंयें वौ न तौ ये जानें! न बतायवे वारे ही इनके पास हैं! लेना बैंक ऑन देना बैंक गॉन!

ब्रजभाषा व्यंग्य – ये थेँक्यु थेँक्यु क्या है ये थेँक्यु थेँक्यु

 थेँक्यु भैया घुटरू.

 भेलकम बत्तो मगर यै थेँक्यु काय लिएं?

ब्रजभाषा व्यंग्य – हैप्पी पुरुष दिवस

 भैया घुटरू, हैप्पी पुरुष दिवस!

 पुरुष दिवस, यै का बलाय होवै है बत्तो?

ब्रजभाषा व्यंग्य – ठाकुरजी की इच्छा

 का है रह्यौ है घुटरू. ब्यारू है गयी कि नाँय?

 कहाँ बत्तो, अभी कहाँ, अभी तौ ऑफिस सों आयौ हों. फ्रैस-व्रैस है लों, फिर पाओं प्रसाद.

ब्रजभाषा व्यंग्य – बेमौसम बरसात

 घुटरू अपुन बचपन में सुनों करते कि बम्बई की बरसात का भरोसा नहीं करने का कभी भी आ सकती है। परन्तु अब तौ भैया पूरी दुनिया में ही ऐसौ है गयौ है कि बरसात कभी भी आ सकती है। बरसात का अब तौ आँधी तूफान हू रोज के से आमन लगे हैं! मगर घुटरू यै समझ में नाँय आय रही कि मौसम बेईमान कैसें है गयौ?

ब्रजभाषा व्यंग्य – मेला और गुब्बारे

 घुटरू मेला’न के अपने मजा हैं। तोय याद है अपुन बचपन में नहाय-धोय कें नये-नये कपड़ा पहर कें नाचते-कूदते मेला’न में जाउ करते। तेरी मैया तौ यै मौटौ-मौटौ काजर हू लगाती तेरी आँख’न में।

ब्रजभाषा व्यंग्य – अंग्रेजी में कहते हैं कि

 घुटरू बड़ौ ही पुरानों गीत गाय रह्यौ है! क्या बात है कछू खास बात है का?

ब्रजभाषा व्यंग्य – दिवाली सेल

घुटरू आज के अखबार की खबर पढ़ी का?

ब्रजभाषा व्यंग्य – ताबड़तोड़ कॉपी पेस्ट

 बोल भैया घुटरू म्हों लटकाएं क्यों बैठौ है? भुजैया सों कछू अनबन है गयी या कछू और बात है? बताय तौ सही!

ब्रजभाषा व्यंग्य – अँगूठा छाप

खूब थी वो मक्कारी खूब ये छलावा है

वो भी क्या तमाशा था ये भी क्या तमाशा है

ब्रजभाषा व्यंग्य – जनता सों बड़ौ जोस्सी कौन

 जवाब रेडी है, हाजिर सवाल होना है

अब इससे बढ़ के भला क्या कमाल होना है

ब्रजभाषा व्यंग्य – अधर पै अम्बा मन में रम्भा

 क्या देख सकते हैं उसी से आत्मजा के रूप को

जिस दृष्टि से हम देखते हैं प्रेमिका के रूप को

ब्रजभाषा व्यंग्य – पितर पक्ष के बहानें

 कहूँ-कहूँ ही परम शुद्ध वस्तु टिक रई हैं

नदी किनारें हू पानी की कैन बिक रई हैं

ब्रजभाषा व्यंग्य – यै कैसौ गणपति विसर्जन

 ये नहीं गाओ, हो चुका क्या है

ये बताओ कि हो रहा क्या है

ब्रजभाषा व्यंग्य – गणपति उत्सव या पार्टी

फैला दसों दिशाओं में जितना प्रकाश है

हर मन में जो बसा है उसी का प्रकाश है

ब्रजभाषा व्यंग्य – बिमारि’न के खरीदार

 हमनें गाड़ी खरीद लीनी है

इक बिमारी खरीद लीनी है

ब्रजभाषा व्यंग्य – मकान नाँय घर बनाऔ

 मकानों के नगर में हम अगर कुछ घर बना लेते

तो अपनी बस्तियों को स्वर्ग सा सुन्दर बना लेते

ब्रजभाषा व्यंग्य – घर तौ महँगे होंमंगे ही

 रस्ते तो चौड़े हो गए

लोग मगर ओछे हो गए

ब्रजभाषा व्यंग्य - मिलावटी मिठाई

 भय से ग्रस्त नहीं हैं लेकिन कबतक पीर छुपाएं कान्हा

तुम्हीं कहो ऐसे ही कबतक स्वयं को हम भरमाएं कान्हा

ब्रजभाषा व्यंग्य – अपने आप बजे दरबज्जे

 हो अटल विश्वास जिनको कायदे पर   

वे फिसल सकते नहीं हैं फायदे पर   

ब्रजभाषा व्यंग्य – उठती गिरती रेटिंग

 बोल बचनों को सदाचार समझ लेते हैं

लोग टीलों को भी कुहसार समझ लेते हैं

ब्रजभाषा व्यंग्य – कल्कि अवतार होय मगर परौस में

 नदी के पार उतरना है गुरूजी

हमें ये काम करना है गुरूजी

ब्रजभाषा व्यंग्य – इन्फ्लुएन्सर

 खूब थी वो मक्कारी खूब ये छलावा है

वो भी क्या तमाशा था ये भी क्या तमाशा है

ब्रजभाषा व्यंग्य – ताऊ तमन्ची

 इस धरती पै मिलते हैं ऐसे भी महामानव

हैं जिनके वचन अमृत पर कर्म निगोड़े हैं

ब्रजभाषा व्यंग्य – पढ़ पढ़ कें पत्थर भये

 हैं बी ए पास पर देते हैं पहरा

न जाने कैसी शिक्षा हो रही है

ब्रजभाषा व्यंग्य – कबूतर कबूतरी’न की पार्टी

 रोज ही करती हैं एलाने-सहर

ओस की बूँदें मुलायम घास पर

बाग तो ढेरों हैं मेरे शहर में

बस वहाँ पंछी नहीं आते नजर

ब्रजभाषा व्यंग्य – लहरिया रोड

 सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी

चोट खाकर भी शराफत कर रहे हैं आदमी

ब्रजभाषा व्यंग्य – बेमौसम बरसात

माना बरसात में बहते हैं उफनकर, फिर भी

नदी-नालों को समन्दर तो नहीं कह सकते

ब्रजभाषा व्यंग्य – धरमसाला

 अब इस दयार में इनका ही बोलबाला है

हमारा दिल तो खयालों की धर्मशाला है

ब्रजभाषा व्यंग्य – सिकायत की हिन्दी

 धरती पै तारे लायवे की जिद्द काहे कों करी

जब कर ई तौ रात की सत्ता पै हैरानी ऐ चों

ब्रजभाषा व्यंग्य – इकबाल मिर्ची – धनिया मिर्ची

 गुरूजी परनाम आपसों मिलवे आयौ तौ मलुम परी आप प्रवास पै गये भये हौ मेरे पेट में मरोरें उठ रई हैं भौतेरी बात आप कों बतानी हैं मगर आप तौ हौ नाँय आप कौ फोन हू नाँय लग रयौ या मारें व्हाट्सअप कर रयौ हों ताकि मेरे पेट की मरोर खतम है जाय और आप जब नेटवर्क में आउ तब पढ़ लेउ

ब्रजभाषा व्यंग्य – रो-रो सेवा

 हर बार घुटरूमल जी हम सों प्रश्न करते आज हमनें विन पै सवाल दाग मारौ घुटरूमल जी आज कौ अखबार बाँचौ कि नाँय? भौत जोरदार खबर छपी है, भौत जल्दी रो-रो सेवा चालू हैवे वारी है। हम भूल गये हुते कि चक्कू खरबूजा पै गिरै कि खरबूजा चक्कू पै, हलाल खरबूजा कों ही होनों परै।

ब्रजभाषा व्यंग्य – खट-मिट्ठौ व्यंग्य

 गुरूजी नैंक फ्री होउ तौ एक बात पूछों? घुटरूमल जी नें पूछी तौ ऐसें जैसें कि वे हमारी अनुमति लै कें ही प्रश्न पूछवे वारे होंय! याद नाँय आवै कि इननें कभू इतनों पेशंस दिखायौ होय।

ब्रजभाषा व्यंग्य – बत्तोरानी

 एक घुटरूमल कम हुते जो बत्तो रानी और हमारे मत्थें मढ़ गयीं. घुटरूमल जी की दूर की रिस्तेदार हैं. मगर एक बात कहनी परैगी साब कछू कहौ बत्तो रानी हैं मन की भोरी. मन में जो होवै सो बोल मारें मतबल बोल डारें.

ब्रजभाषा व्यंग्य – अवॉर्ड सेरेमनी

 चाय पीते भए अखबार के पन्ना पलटे तौ एक फुल पेज कौ विज्ञापन दिखाई परौ अवॉर्ड सेरेमनी। आयोजक की जगें घुटरूमल जी कौ नाम।

ब्रजभाषा व्यंग्य – ब्लू ड्रम वारी रील

कंधा पै गमछा डारें घुटरूमल जी पधारे और आते ही विनकौ लाउडस्पीकर चालू है गयौ। गुरूजी पतौ है आजकल कौन सी रील ट्रेंड कर रही है? तुम का जानों? तुमें तुमारे मिसरा, सुकला’न सों फुरसत मिलै तब तौ जानौगे?

ब्रजभाषा व्यंग्य – मुफत कौ चन्दन

 घुटरूमल कभू-कभू थोड़े जादा ही सेंटी है जामें। सामान्य सी लगवे वारी बात’न पै हू विचलित है जामें । आज बोले गुरूजी समझ नाँय आवै लोग पच्चीस-पचास रुपैया बचाय कें कौन सौ तीर मार लेमें हैं?

ब्रजभाषा व्यंग्य – अथ रायता पुराण

 घुटरूमल जी के भतीजे की बरात हुती हमनें पूछी और साब का-का माल रहे? बोले पूछौ ही मत 10 तरें के रोटी, परामठे, पूरी; पन्द्रह तरें के साग, बीस तरें की मिठाई और अनेक’न तरें के रायते। एक होय तौ नाम गिनामें बूँदी कौ, चुकन्दर कौ, गाजर कौ, सेव-अनार कौ, पापर, लौकी, ककड़ी, मूरी, आमी, गोभी, भिण्डी और हू न जानें का-का, पूछौ ही मत। लोग मिठाई’न की कम और रायते’न की जादा चर्चा कर रहे हुते और गुरूजी कछू लोग तौ रायता-पुराण हू बाँच रहे हुते।

ब्रजभाषा व्यंग्य – नोटा

 घुटरूमल जी नें पूछी गुरूजी यै नोटा क्या बला है? हमनें कही प्रभु चुनाव’न की दृष्टि सों तौ “नन ऑफ द अबव” मतलब NOTA और सामान्य शब्द’न में कहें तौ गाँधी जी के तीन बन्दर’न की तरें तटस्थ है जानों यानि नोटा।  हालाँकि वर्तमान व्यवस्था के अनुसार नोटा के वोट हार जीत की गिनती में वैसें ही नाँय गिने जामें जैसें जुग्ग’न सों रोती बिलखती जनता कौ कष्ट, कष्ट मानों ही नाँय जाय रह्यौ। मगर हाँ नोटा की बढ़ती संख्या या बात की गारण्टी है कि आज नाँय तौ कल वो सुबह कभी तो आयेगी।

ब्रजभाषा व्यंग्य – ब्राह्मण’न की दसा

 ब्राह्मण’न के बारे में बहुधा पूर्वाग्रह सों ग्रस्त रहवे वारे घुटरूमल जी जब बोले कि गुरूजी जो मजा पण्डिताई में है वौ कहूँ नाँय तौ हमें लंकादहन सों पहले कौ वौ सीन याद आय गयौ जामें रावण बोलै “तेल बोरि पट बाँधि पुनि, पावक देहु लगाय” और पवनपुत्र मन ही मन बोलें “भई सहाय सारद मैं जाना”।  घुटरूमल जी एक वार जो ठान लेंय वौ कर कें ही मानें। सो हम मौन ही रहे।

ब्रजभाषा व्यंग्य – विरोध या पब्लिसिटी

 घुटरूमल जी बोले, गुरूजी याद करौ कछू समय पहलें एक फिल्मी गानों आयौ हुतो बीड़ी पी के नुक्कड़ पै वेट तेरा किया रे खाली पीली अठारह कप चाय भी तो पिया रे आदि आदि इत्यादि और लास्ट में एबीसीडी पढ़ ली बहुत अच्छी बात कर ली बहुत अब करूँगा तेरे साथ गंदी बात  गंदी बात गंदी गंदी गंदी बात। 

ब्रजभाषा व्यंग्य – महामण्डलीश्वर

 भौत दिना है गये घुटरूमल जी आये नाँय सो हमनें खैर खबर लैवे कों फोन लगायौ तौ पतौ चलौ कि आप काऊ ठेकेदार के संग प्रयागराज महाकुम्भ में गये भये हैं।

ब्रजभाषा व्यंग्य – पूछरी के लौठा

 कछू दिन पहलें एक खबर आयी कि सरकारी चपरासी के पास करोड़’न की सम्पत्ति मिली। जभू ऐसी चर्चा चलें तौ  सोसायटी वारे परिचर्चा आयोजित करें। अबकौ विषय हुतो ‘भ्रष्टाचार उन्मूलन’। वक्ता’न में घुटरूमल जी कों हु बुलायौ गयौ। घुटरूमल जी के वक्तव्य के मेन-मेन पॉइण्ट’न कौ आप हू आनन्द लेउ।

ब्रजभाषा व्यंग्य – राज को राज रहने दो

 घुटरूमल जी गुनगुनाय रहे हुते इसारों को अगर समझो राज को राज रहने दो। हमनें पूछी तौ विननें बतायी गुरूजी आपकों अपनी झुमरीतलैया की समाजसेवी-संस्था  ‘जीव-जन्तु  सेवा-संघ’ याद होयगी। मनुष्य, पशु, पक्षी यानि समस्त जीव-जन्तु’न की सेवा में सदा तल्लीन, बल्कि सबसों आगें।

ब्रजभाषा व्यंग्य – बघार के प्रकार

जैसें टी वी रेडियो पै वार्ता आमें ऐसें ही एक मुहल्ला-ब्राण्ड-मोबाइल-चैनल वारौ घुटरूमल जी सों बघार के बारे में पूछवे आयौ। सर्वगुण-सम्पन्न घुटरूमल जी और विनके बीच के प्रश्न-उत्तर’न कौ आप हु आनन्द लेउ:

ब्रजभाषा व्यंग्य – सायरी नये जमाने की

घटरूमल जी आज बड़े ही सायराना अन्दाज में बोले गुरूजी चलौ आज नये जमाने की सायरी सुन आमें। हमारी प्रश्नवाचक-मुद्रा भाँप कें बोले, आज ढपोलसंख-हॉल में एक कार्यक्रम है “एक साम बेगम नस्तर और मामा कनस्तरी के नाम”। हम हू बैठें-बैठें बोर है रहे हुते, सोची चलौ सुन आमें। हॉल फुल्लम-फुल्ल पैक। सबसों पहलें बेगम नस्तर माइक पै आईं और बोलीं

ब्रजभाषा व्यंग्य – बुफे सिस्टम वारी बरात

 दूर के रिश्तेदार के छोरा की बरात हुती। बन-ठन कें अपुन बरात में जैमे निकसे। रस्ता में घुटरूमल जी मिले। इनकी हु वहाँ रिश्तेदारी है सो हमनें पूछी चल नाँय रहे, फलाने के बेटा की बरात जैमे? साब घुटरूमल जी तौ ऐसें भड़के जैसें काहु नें साँड़ कों लाल कपड़ा दिखाय दियौ होय।

ब्रजभाषा व्यंग्य – मथुरा वृन्दावन के बन्दर

 घुटरूमल जी बोले बड़े साल’न बाद आये हौ चलौ तीन वन की परकम्मा दै आमें। दिवारी के बाद देवोत्थान एकादशी के दिन तीन वन की परकम्मा लगै। मथुरा, गरुण-गोविन्द और वृन्दावन इन तीन वन’न की परकम्मा। 

ब्रजभाषा व्यंग्य – घुटरूमल और बेगम नस्तर

 धौंताएँ (सबेरें-सबेरें) घुटरूमल जी आये। आज विनके संग एक कन्या हु आयी। आँख’न में मौटौ- मौटौ काजर, लम्बे-लम्बे द्वै चुट्टा जिनमें लाल-लाल रिबन, गहरी गुलाबी लिपिस्टिक और सदा-हसन्ती यानि हँसती ही रहै। आते ही घुटरूमल जी नें परिचय दियौ गुरूजी यै हमारी नई भायली मतबल सहेली, बेगम-नस्तर। ये हु सायरा हैं।

ब्रजभाषा व्यंग्य – पटाखे मत फोरौ

 सबेरें-सबेरें घुटरूमल आये और झुँझराय कें बोले अपने त्यौहार आते ही जरुआ-फुकुआ सी पोस्ट क्यों आमन लगें? होरी मत खेलौ, पतंग मत उड़ाऔ, पटाखे मत फोरौ। इनके बिना त्यौहार, त्यौहार जैसे लगंगे का? एक तौ वैसें ही रुजगार की मजबूरी नें परिवार’न के खील-बिछट्टा कर रखे हुते, रही-सही कसर मोबाइल’न नें पूरी कर दीनी। पास-पास बैठे दो जने हु आपस में बात न कर कें मोबाइल’न में घुसे रहें!

ब्रजभाषा व्यंग्य – इण्टरव्यू कौ पाँचवौ तत्व

अँधेरे यों ही तो घिरते नहीं हैं

उजालों ने किनारा कर लिया क्या

ब्रजभाषा व्यंग्य – साफ सफाई

हम अपने दर्द को कुछ इस तरह भुलाते हैं
खुद अपने आप ही अपना मजाक उड़ाते हैं

ब्रजभाषा व्यंग्य – सर्वर डाउन

सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी

चोट खाकर भी शराफत कर रहे हैं आदमी

ब्रजभाषा व्यंग्य – चर्बी वारौ घी

जब सों सुनी है कि तिरुपति बालाजी के मन्दिर के लडुअ’न में जो घी इस्तेमाल कियौ जाय रयौ है वा में चर्बी है हम भौत परेसान हैं। हमेसा तौ हम घुटरूमल जी कों ज्ञान देमें परन्तु या बार हमारी हालत पै तरस खाय कें घुटरूमल जी नें हम पै कृपा करी।

ब्रजभाषा व्यंग्य – मूसे भगाऔ द्वीप बचाऔ

घुटरूमल जी अखबार पढवे के सौकीन हैं। काऊ काऊ दिन तौ चार चार अखबार’न कों हु पढ़ मारें। पढनों का जी बस हैडिंग पै नजर डारें और फिर यै सेर हू सुनाय मारें कि “ बढ़ते बढ़ते बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गई है रफ्तार; पाँच मिनट में पढ़ लेते हैं दस पन्नों वाला अखबार”। हाँ कोउ अलग सौ हैडिंग दीखै तौ विस्तार सों न केवल पढ़ें बल्कि वा की चर्चा हमसों हू करें।

ब्रजभाषा व्यंग्य – बोल बच्चन के मास्टर

कोउ त्यौहार, दिवस, जयन्ती आदि आये नाँय कि इण्टरव्यू’न की लैन लग जावै। आर्टिफिसियल इण्टेलीजेन्स की कृपा सों ये इण्टरव्यू जन जन तक पहुँच हू जामें हैं। “पर उपदेस कुसल बहुतेरे” कौ मरम समझवे वारे तौ  ऐसे वीडियो’न कों स्किड कर देमें परन्तु बिचारे भोरे भामरे लोग न केवल इन वीडियो’न कों देखें बल्कि अनुसरण हू करनों चाहें।

ब्रजभाषा व्यंग्य – इन्स्टाग्रामी घुटरूमल

घुटरूमल जी कों नित्त नई सनक सूझती रहें। एक इच्छा पूरी भई नाँय कि दूसरी कों लै कें घुटन लगें। या ई मारें तौ इन कौ नाम घुटरूमल परौ। आजकल एक नई सनक चढ़ी है, विनें मसहूर होनों है।

ब्रजभाषा व्यंग्य - म्हों मीठौ है जावैगौ

घुटरूमल जी नें भौत कोसिस करी कि हम विनें हिन्दी दिवस पै कछ लिख कें दै देमें परन्तु हमारौ मूड बन नहीं पायौ। दरअसल गाम के कुआ में अफीम घुर गयी होय ऐसे में जिननें वौ पानी पी लियौ वे सियाने और जिननें नाँय पियौ वे बावरे । हमनें अफीम घुरौ पानी नाँय पियौ, आप हमें बावरौ कह सकौ ।

ब्रजभाषा व्यंग्य – तू खींच मेरी फोटो पिया

घुटरूमल जी फिल्मी गीत’न के जबरदस्त सौकीन. नैंक मूड बन्यौ नाँय कि गामन लगे. इन पै गायवौ नाँय आवै यै अलग बात है मगर इनकौ मोबाइल टॉप के गीत’न सों भर्यौ रहै. पवित्र नगरी उज्जैन में महाकाल के दरसन करवे गये हुते. 

ब्रजभाषा व्यंग्य – रोट राजधानी के

घुटरूमल जी बन ठन कें  मुम्बई जायवे कों निकसे. विज्ञापन हुतो रसोइया कौ. ये तौ रसोई एक्सपर्ट, एप्लाई कर दियौ. एप्लीकेसन में पूछी आप कितने प्रकार की चटनी बनाय सकौ? इननें लिखी, अजी धनिया क्या हम तो बड़े बड़ों की चटनी बना चुके हैं

ब्रजभाषा व्यंग्य – बोलौ पलकारी मैया की जय

ब्रजभाषा में सीढ़ी कों सिड्डी कहें और बड़ी साइज की सिड्डी कों सिड्डा. सिड्डि’न कों  पलकारी हू कह्यौ जावै है. आप नें वौ शेर तौ सुन्यौ ही होयगौ “लाजिम है ढूँढें और फिर बरतें सलीके से उन्हें; हर लफ्ज को हर दौर में अपनी कहानी चाहिए”. 

ब्रजभाषा व्यंग्य – पब्लिक होस में होती तौ

एक दिन घुटरूमल जी हमारे पास आये और बोले भाईसाब हमें नेता बननों है, हमें नेता बनवे कौ नुस्खा बताय देउ । पहलें तौ हमनें विनें ऊपर सों नीचे तक देखौ फिर पूछी यै बताऔ आप का टाइप के नेता बननों चाहौ ? 

ब्रजभाषा व्यंग्य – नेता सों जादा चमचा मजा में रहें

हालाँकि हम नें पहिलें कह दई हुती कि खैर अपुन कों का? परन्तु का करें साब कछू भी कह लेउ, सोच विचार तौ करनों ही परै. अब देखौ आप ही बताऔ यै कोउ बात है? लड़ाई होय इजराइल और ईरान की और शेर बजार हमारौ भरभराय कें गिर परै! 

ब्रजभाषा व्यंग्य – खैर अपुन कों का

ऑफिस में काम करते करते भए बोर है गयौ तौ सोची चलौ नेंक समाचार सुन लेंय. टी वी खोली तौ सुनाई परी – देखिये हमारे चैनल पर सब से पहली बार – मन में सोची ये आठवों आश्चर्य कैसें है सकै, सब सों बाद में जो नींद सों जागै है वौ सब सों पहलें खबर कैसें बताय सकै . खैर अपुन कों का.

संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

             संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी
(ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

·       नाम नवीन सी. चतुर्वेदी

·       पिताजी – श्री छोटुभाई बिहारी श्रीजी चतुर्वेदी

·       माताजी – श्रीमती पुष्पादेवी

·       जीवन संगिनी – श्रीमती रेखा

 

·       जन्म - २७ अक्तूबर १९६८ को मथुरास्थ माथुर चतुर्वेद परिवार में (शासकीय जन्मतिथि १ जनवरी १९६९)

·       जन्म स्थान – मथुरा (उत्तर प्रदेश)

·       शिक्षा- वाणिज्य स्नातक

·       कार्यक्षेत्र - मुम्बई में Security-Safety-IT Equipments के व्यवसाय में संलग्न  www.vensys.in

 

·       साहित्यिक गतिविधियाँ

1.      ब्रजभाषा, हिन्दी, उर्दू, गुजराती, एवं मराठी इन पाँच भाषाओं में ग़ज़ल सृजन के प्रयास

2.      ब्रजभाषा में गजलों का शुभारम्भ किया तथा अन्य शायरों / शायराओं को इस विधा से जोड़ा । वर्तमान में 30 से अधिक व्यक्ति ब्रजभाषा में गजलें कह रहे हैं।

3.      अन्तरजाल के माध्यम से पिंगलीय छन्दों एवम् ग़ज़लों से सम्बन्धित अर्जितोपार्जित ज्ञान पर कार्यशालाओं का आयोजन

4.      देशभर में अनेक मंचों से काव्यपाठ

5.      विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन एवम् अन्तर्जालीय उपस्थितियाँ

6.      औडियो / वीडियो अल्बम्स के लिए लेखन

7.      प्रकाशित पुस्तकें

a.      “पुखराज हबा में उड़ रए एँ” (सर्वप्रथम ब्रजगजल संग्रह) – 2015

b.      “ब्रजगजल संग्रह” (निज एवं अन्य 12 इस प्रकार कुल 13 व्यक्तियों की ब्रजगजलों का साझा संकलन )2018

c.      “मोरछल” (एकल स्तर पर द्वितीय और सर्वकालिक स्तर पर तृतीय ब्रज गजल संग्रह) – 2020

d.      “धानी चुनर” (रसीली एवं व्यंजनात्मक हिन्दीगजलों का संग्रह) – 2022

e.      “विहान” (रसीली एवं व्यंजनात्मक हिन्दीगजलों का संग्रह) – 2025

f.       “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह - 2025

8.      सम्मान / पुरस्कार

a.      2020 में प्रकाशित ब्रजगजल संग्रह ‘मोरछल’ के लिए  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाबु जगन्नाथ दास रत्नाकर पुरस्कार (ब्रजभाषा कोटि में प्रथम पुरस्कार)

b.      हिन्दी पुस्तकालय समिति डीग (राजस्थान) द्वारा ब्रजभाषा में गजलों के शुभारम्भ के लिए सम्मान . अब समिति द्वारा प्रति वर्ष होने वाली प्रतियोगिताओं में ब्रजगजलों के लिए एक भिन्न श्रेणी नियत कर दी गयी है और इस श्रेणी के विजेता को नकद पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है ।

c.      साहित्य सम्मलेन नाथद्वारा द्वारा ब्रजभाषा में नयी विधा ब्रज गजल का शुभारम्भ करने एवं अन्य व्यक्तियों को भी इस प्रकल्प में जोड़ने के लिए सम्मान। यह संस्था भी ब्रजभाषा की गजलों के लिए वार्षिक पुरस्कार प्रदान कर रही है।

d.      इंशाद द्वारा विविध भाषाओं में ग़ज़ल सृजन हेतु ‘फ़रोग़-ए-इंशाद’ सम्मान

e.      उपरोक्त चार पुरस्कार / सम्मान सम्प्रति उल्लेखनीय हैं

9.      हिन्दुस्तानी साहित्य सेवार्थ “कविता कोष” एवं "साहित्यम" सहित अनेक वेब पोर्टल्स के सम्पादकीय-मण्डलों में प्रतिनिधित्व 

10.  सम्पर्क:

a.      Mobile No. 9967024593

b.     Email: navincchaturvedi@gmail.com