जब सों सुनी है कि तिरुपति बालाजी के मन्दिर के लडुअ’न में जो घी इस्तेमाल कियौ जाय रयौ है वा में चर्बी है हम भौत परेसान हैं। हमेसा तौ हम घुटरूमल जी कों ज्ञान देमें परन्तु या बार हमारी हालत पै तरस खाय कें घुटरूमल जी नें हम पै कृपा करी।
वे आगें बोले गैया
के दूध सों एक किलो घी बनानों होय तौ 20 लीटर दूध लगै और अगर भैंस के दूध सों बनानों
होय तौ कम सों कम 10 लीटर दूध की जरूरत परै ही परै। भैंस कौ दूध अगर 70 रुपैया
किलो हु समझ लेउ तौ 700 रुपैया कौ तो केवल दूध ही है गयौ। अब या में प्रॉसेसिंग
कॉस्ट एड करौ। वा के बाद पैकिंग कॉस्ट, प्रिजर्वेटिव कॉस्ट, स्टोरेज कॉस्ट, फ्रेट-फॉरवार्डिंग कॉस्ट, कम्पनी प्रॉफिट, डिस्ट्रीब्यूटर
प्रॉफिट, रिटेलर यानि
दुकानदार कौ प्रॉफिट और सब के ऊपर राजा कौ लगान यानि जी एस टी; नाँय नाँय करते भये
हु हमें लगै यै लागत 1500 रुपैया तक तौ पहोंच ही जाती होयगी।
अब आप स्वयं सोचौ
जो मटेरियल डेढ़ हजार रुपैया में परतौ दीख रयौ है वाय आप औसत 500 - 700 रुपैया किलो में
खरीद रहे हौ और पवित्रता की आसा हु रख रहे हौ। कमाल है पीतर के भाव में सोंनों
खरीदनों चाहत हौ?
हमें नाँय पतौ कि
बजार में मिलवे वारे घी कैसें बन रहे हैं? न हमें यै पतौ कि अच्छी क्वालिटी वारे
घी की सही लागत और कीमत का होनी चैंयें? हमनें तौ 400 सब्द’न में जो समझाय सकते वौ
समझायवे की कोसिस करी है बस। शेष समझदार
तौ आप हौ ही। बस यै ही कहंगे कि जब चाय के कप में परी भई मक्खी स्पष्ट दिख रही है
तौ या तौ वा चाय कों पियौ ही मत और जो पी रहे हौ तौ फिर उस्ताजी मत पेलौ। हमें
क्लीन बोल्ड करिवे के बाद घुटरूमल जी पण्डित प्रदीप जी कौ गीत गामन लगे मुखड़ा देख
ले प्राणी जरा दरपन में। सच्चऊँ आज तौ हमें दरपन दिखाय दियौ घुटरूमल जी नें और यै
दरपन बताय रयौ है कि जनसंख्या ऐसें ही बढ़ती रही तौ घी का पानी उ नाँय मिलैगौ। जय
राम जी की।
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