लोग मगर ओछे हो गए
घुटरू कित्ती सच्ची बात है जबतक रस्ता सँकरे हुते लोग’न के हृदय विशाल हुते। विचार उच्च स्तर वारे हुते। जैसें-जैसें रस्ता’न कौ चौड़ीकरण होतौ जाय रह्यौ है हृदय विशाल सों विकराल और विचार उच्च सों तुच्छ होते जाय रहे हैं।
हाँ बत्तो, काहु नें सच्ची कही है विकास अपनी कीमत वसूल करै। बहुधा यै कीमत संस्कृति और संस्कार’न के रूप में ही होवै है। पहले जमाने में रस्ता चलते ठोकर लग कें कोउ गिर परतो तौ फौरन चार-छह आदमी दौरे-दौरे आते, वा कों उठाते, जादा लगी तौ नाँय ऐसौ पूछते, खुद्द ही वाके कपड़ा झारवे लगते, पानी पिवाते, कहूँ सीरक में बिठाते और जब वौ व्यक्ति नॉर्मल है जातो तब अपने-अपने काम-काज’न पै लगते। अब तौ डूबते आदमी कों बचायवे की जगें वीडियो बनामें हैं लोगबाग।
सही कह रह्यौ है घुटरू। पहले जमाने में चकिया पै गेंहू पीसौ करते। वा खुरदुरे चून की रोटी खायवे वारे’न कों न तौ कभू प्रोटीन की कमी महसूस भयी न आँत’न के उपरेसन करवाने परे। मसाले हु घर’न में ही पिसौ करते। विन मसाले’न सों काहु कों एसिडिटी भयी होय ऐसी मैनें तौ नाँय सुनी। न पहले जमाने में फ्रोजन-सोल्जर जैसी बिमारी होतीं।
हाँ बत्तो मर्द-मांस हू रोज के से दस-बीस किलो कौ बोझा उठाय कें मील दो मील तौ चल ही लेउ करते। कुआँ’न सों पानी खेंचनों, घाट-बगीची’न कों झारनों-बुहारनों, बाल-बच्चा’न कों कन्धा पै बिठाय कें मेला-नुमाइस’न में लै जानों रूटीन हुतो। मस्त-मलंग रहवे वारे विन लोग’न कों एंजियोप्लास्टी नाँय करवानी परतीं। अब तौ दरबज्जे सों ही बाइक पै बैठनों है।
घुटरू एक मकान में कित्ते सारे लोग रह लेउ करते। दो मैया बाप। चार बेटा हैवौ तौ सामान्य बात होती वा जमाने में। चार बेटा चार बहू। फिर विन के चार-चार बच्चा। एक-दो पुरखा हू होऔ करते वा जमाने में। दोयते-दोयती हू रहौ करते। कभू-कभार अरगल-परगल हू होते। एक मकान में तीस-चालीस व्यक्ति’न कौ रहवौ सामान्य सी बात होऔ करती। मकान हू दल्लान जैसे होऔ करते। समय कित्तौ बदल गयौ घुटरू।
हाँ बत्तो समय तौ भौत ही बदल गयौ है। अब तौ चार जने’न की माइक्रो फेमिली कों हु चार कमरा’न कौ घर चैंयें। घर कहाँ अब तौ कबूतर’न के दड़बा हैं दड़बा। वे हु करोड़’न के। लोग कहें कि घर महँगे है गये! अरे भैया, जब सबकों ही सेपरेट रहनों है तौ घर तौ महँगे होमंगे ही।
सबको अलाहदा रहना था
देख लो घर महँगे हो गए
नवीन सी.
चतुर्वेदी
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