गुरूजी परनाम। आपसों मिलवे आयौ तौ मलुम परी आप प्रवास पै गये भये हौ। मेरे पेट में मरोरें उठ रई हैं। भौतेरी बात आप कों बतानी हैं। मगर आप तौ हौ नाँय। आप कौ फोन हू नाँय लग रयौ या मारें व्हाट्सअप कर रयौ हों ताकि मेरे पेट की मरोर खतम है जाय और आप जब नेटवर्क में आउ तब पढ़ लेउ।
वैसें नाँय पढ़ौगे तौ हु का हमें तौ अपने मन की बात कहनी है। मन की बात कहवे वारे अपने मन की बात कहवे पै फोकस रखें सुनवे वारे की फिकर थोरें ही करें। सुनवे वारे सुनें तौ ठीक नाँय सुनें तौ हु ठीक। जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला की तरें जो सुने उसका भी भला जो न सुने उसका भी भला।गुरूजी आपकों याद होयगी अपुन बचपन में एक
बार फिलम देखवे गये हुते। पिक्चर हॉल के बाहर एक बड्डे से पोस्टर पै
लिख्यौ भयौ हुतो “इकबाल मिर्ची की
कहानी” । अपुन दौनों’न नें सोची कोउ अंडरवर्ल्ड टाइप कहानी होयगी। खूब ढिशुम ढिशुम होयगी। लाली लिपिस्टिक वारे सीन हू होमंगे वगैरा
वगैरा। मगर गुरूजी खोदौ पहार और निकसी चुइया। पोस्टर तौ हुतो इकबाल मिर्ची की कहानी कौ मगर बजमारे नासपीटे दिखाय रहे हुते धनिया
मिर्ची की कहानी। धनिया और मिर्ची कितने प्रकार के होमें। कैसें उगाये जामें। कहाँ इनकी कितनी डिमाण्ड है। अपने यहाँ के धनिया मिर्ची क्यों दुनिया में चर्चा में नाँय नें आदि आदि। माथौ पीट मारौ हुतो अपुन दौनों’न नें। पैसा फूँक कें टिकट खरीदी सो अनमने मन सों फिलम देखनी हु परी।
आप सोच रहे होउगे कि मैं कहनों का चाह रह्यौ हों। दरअसल गुरूजी आजकल भौत सारे कार्यक्रम कछू ऐसे ही होमन
लगे हैं। बुलामें इकबाल मिर्ची की कहानी सुनायवे कों मगर परोस देमें धनिया मिर्ची
की कहानी। अगर कोउ स्रोता टोक देय तौ कहन लगें आप इस विषय को जानते नहीं हैं इसलिए
समझ नहीं पा रहे। आप समझने की कोसिस करो। मगर गुरूजी आप तौ समझ ही गये होउगे।
आपकी भौत पहलें कही भई बात याद आय
रही है कि जब गाम के कुआँ में अफीम घुर चुकी होय तौ जिननें अफीम घुरौ पानी पी लियौ
वे सब सियाने और जिननें नाँय पियौ वे बाबरे। का करें हमारे जैसे लोग अब बाबरे’न
में ही गिने जामें। बात तौ और हु घनेरी हैं। बाद में मैसेज करों। जय राम जी की। आपके
प्राण’न कौ प्यासौ …… सॉरी सॉरी प्यासौ नाँय आपके
प्राण’न कौ प्यारौ घुटरूमल।
नवीन सी.
चतुर्वेदी
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