ब्रजभाषा व्यंग्य – यै कैसौ गणपति विसर्जन

 ये नहीं गाओ, हो चुका क्या है

ये बताओ कि हो रहा क्या है

 

है गयौ गणपति विसर्जन बत्तो?

 

हाँ घुटरू है गयौ। कैसे अनन्द आये हैं घुटरू का बताओं? गली-गली, सोसायटी-सोसायटी और अनेक’न घर’न में गणपति आये। कैसे उत्सव मने हैं! कैसे-कैसे प्रोग्राम भये हैं बस पूछ ही मत!

 

और वाके बाद?

 

वाके बाद का? वौ ही जो हर साल होवै! विसर्जन! लास्ट वारे दिन खूब जोरदारी सों झूम-झूम कें आरती होवै, स्तुति होवै, प्रसाद बटै और बैंड-बाजे’न के संग नाचते-झूमते भए विसर्जन। हर तरफ यही सुनाई परै गणपति गेले गावाला चैन पड़े ना आम्हाला। गणपति बप्पा मोरिया पुढच्या वर्षी लवकर या।

 

कमाल के लोग हैं न हमतुम?

 

क्यों? का भयौ? कछू गलत है का यामें?

 

बत्तो नैंक याद कर कें बताय लास्ट टाइम तू जब काहू के घर गयी तौ कैसौ अनुभव रह्यौ?

 

घुटरू लास्ट टाइम में अपनी एक सहेली के घर गयी। वानें भौत अच्छे सों वेलकम कियौ। फेमिली के लोग’न सों बढ़िया परिचय करवायौ। हमारी फ्रेंडशिप कैसें भयी, कैसें टिकी और क्यों महत्वपूर्ण है ये सब बातें याद करी गयीं। दुनिया कों भूल कें पूरौ समय हम दौनों बस एक दूसरे की बातें ही करते रहे। वानें स्वयं अपने हाथ’न सों पकवान बनाये और बड़े ही चाव सों खवाये। हमनें खूब मौज-मस्ती करी। लगौ ही नाँय कि मैं वाके घर में हों। बिल्कुल अपने घर जैसौ लगौ। डेढ़ घण्टा बाद मैंनें निकरनों चाहौ तौ वानें जबरदस्ती बैठाय लीनी। बोली तू कौन सी रोज-रोज आवै। अब की गयी फिर साल दो साल बाद आवैगी और हाथ पकर कें बैठाय लीनी।

 

फिर वाके बाद?

 

फिर वौ ही मौज, मजा, मस्ती, खान-पान, हास-परिहास। केवल मीठी-मीठी बातें। कड़वाहट कौ दूर-दूर तक नामोनिशान नाँय। भौत देर है गयी तौ मैं नें कही अब मोय जामन दै तब वौ मानी। घर के बाहर तक छोड़वे आयी। जब तक मैं वाहन में बैठ कें वाकी आँख’न सों ओझल नाँय है गयी खड़ी-खड़ी एकटक देखती रही। सच्चऊँ आवभगत होय तौ ऐसी।

 

बस बत्तो मैं यही कहनों चाह रह्यौ हुतो। हम गणपति के संग ऐसौ ब्यौहार करें हैं का? हम  विसर्जन नाँय करें लिटरली फेंकें पानी में। अगले दिन के सीन तौ अखबार और न्यूज चैनल वारे दिखाय ही देवें हैं। ऐसी ही दूसरी कहानी भागीरथ की है वे ही भागीरथ जो गंगा लाये। आज स्वर्ग सों जब गंगा की दुर्दशा देखते होंगे तौ

 

खुद भगीरथ भी सोचते होंगे

क्या किया था मगर हुआ क्या है

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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