ब्रजभाषा व्यंग्य – सॉरी है कि सत्तनरायन कौ प्रसाद

 एक बात तौ कहनी परैगी घुटरू अंग्रेज’न नें हमें ऐसे-ऐसे सब्द दिये हैं कि बस पूछौ ही मतजैसें सॉरी कों ही लै लै। बीच बजार में आदमी की पाग उतार देउ और जस्ट सॉरी कह कें घर की घटिया चढ़ जाउ। काऊ अच्छे-भले आदमी की गाड़ी ठोक देउ और कन्धा उचकाते भए सॉरी बोल कें पतरी गली सों निकल्लेउ।

 हाँ यै बात तौ है बत्तो आदमी बड़ौ ही असम्वेदनशील है गयौ है। सॉरी तौ ऐसें बोलतौ फिरै जैसें कि सत्तनरायन कौ प्रसाद बाँट रह्यौ होय। लैवे वारे हू बिचारे प्रसाद समझ कें न केवल ग्रहण कर लेमें हैं बल्कि प्रसाद की तरियाँ ही पूरी श्रद्धा सों मूँड़ माथे सों हू लगाय लेमें हैं। ऊपर ते “कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, हो जाता है, इट्स आल राइट” जैसे वाक्य बोल कें जितने हैं नाँय वा सों जादा भले बनवे कौ ड्रामा और करें हैं।

 

बिल्कुल घुटरू, न कहवे वारौ ग्लानि के संग सॉरी कहै न सुनवे वारौ सदाशयता के संग इट्स ऑल राइट कहै बस एक कृत्रिम सज्जनता की नौटंकी है जाकौ धड़ल्ले सों खुलेआम मंचन है रयौ है।

 

बत्तो एक और मजे की बात देख छोटी-छोटी सी बात’न पै सॉरी-सॉरी बोलते रहवे वारे सॉरी-पति जहाँ सॉरी कह दैनी चैंयें वहाँ भूल कें हू सॉरी नाँय कहें। विशेषकर तब जबकि विनें अच्छी तरें पतौ होवै है कि एक बार सॉरी कह दैवे सों भौत बड़ी समस्या कौ चुटकी में समाधान है सकै तौ हू न जानें क्यों विनके श्रीमुख सों सॉरी फूट ही नाँय पावै! है नें अचरज की बात!

 

घुटरू मोय तौ यामें अचरज जैसौ कछू नाँय लगै बल्कि नपी तुली सियासी चाल जैसी दिखाई परै है। चौसर के पासे की तरें सब्द’न कौ इस्तेमाल करवे वारे सतरंज के खिलाड़ि’न कों लै कें मैं कभू दुविधा में नाँय रहों। ऐसे लोग पहलें हालात कों तराजू पै तोलें वाके बाद ही सब्द’न कों बोलें। यदि सॉरी कहवे सों चार खुस मगर आठ दुखी है सकें तौ ये भलें ही तीन के तेरह कर दंगे मगर सॉरी नाँय बोलंगे। हाँ यदि समीकरण उलटे होंय तौ न केवल सॉरी बोल दंगे बल्कि भरी महफिल में कान पकर कें उठक-बैठक हू लगामन लगंगे। वैसें घुटरू तू बताय अगर तो सों कोऊ सॉरी कहै तौ तू कैसें रिएक्ट करैगौ?

 

बत्तो या मामले में अपुन तौ एकदम क्लियर हैं कि

 

दिल उसकी सारी खताएं मुआफ कर देगा

बस उसकी आँखों में इक मरतबा मलाल दिखे

 

नवीन सी चतुर्वेदी

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