अब का बतामें साब, कछू बरस पहले की बात है, एक सज्जन कों जब पतौ चलौ कि हम कवि हैं तौ बोलौ “कवि जी कुछ सुनाओ”. हम हू नये नये मुल्ला बने भये हुते, सो भैया एकदम जोस में भर कें बोले
इनकी आँखों में गजब की रौशनी
है
हमनें सोची कि बन्दा हमारी
पीठ थपथापयेगा. मगर साब वौ पठ्ठा तौ “कवि जी कविता सुनाओ कविता”
कहते भये उत्तर की जगें दक्खिन मुखी है गयौ. हम वाकों देखते रह गये. का कहते. बात
आयी गयी है गयी.
कछू बरस बाद फिर भेंट भयी, वौ फिर बोलौ “और कवि जी क्या हालचाल हैं, कुछ कविता
बबिता सुनाओ भाई”. एक बार तौ मन में आयी कि टरकाय देंय. फिर सोची, है सकै घड़ा पक गयौ होय, अब याकी बुद्धि और विवेक अपग्रेड है चुके होंय. सो हमनें सुनायौ
बस हवाओं के भाव खुलने हैं
खुशबुओं का तो हो चुका सौदा
साब का बतामें, भले आदमी नें फिर सों वौ ही बात दुहराय दीनी. बोलौ “नहीं साब, कविता सुनाओ कविता”. हमारौ दिमाग घूम गयौ मगर हमनें पेशंस नहीं खोयौ.
इग्नोर कर दियौ. बात फिर आयी गयी है गयी.
कछू साल बाद फिर वाके दरसन
भये, फिर वौ ही फरमाइस “और कवि जी क्या हालचाल
हैं, कुछ कविता बबिता सुनाओ यार”. अबतक
हम युग कवि’न सों और विनकी युग-कविता’न सों थोरे अधिक परिचित
है चुके हुते सो अबकी बार हमनें तय कर लीनी कि “मट्टी के कच्चे घड़ा में दूध
ओंटायवे में समझदारी नाँय नें”. जैसौ देवता है वैसी ही पूजा करी जाय. सो भैया अबकी बार हमनें वाय यै बारी युग-कविता सुनायी
भोरे भारे बलम हमारे नित
नवीन उतपात करत हैं
सावन में तौ आग लगामें फागुन
में बरसात करत हैं
हम जो राष्ट्रपती होते तौ
पदम-सिरी दै देते इन कों
हनीमून पै लै कें जामें हनूमान
की बात करत हैं
मत पूछौ साब इन पंक्ति’न कों सुन कें तौ जैसें वाकी सात पुस्त तर गयीं. जैसें वाय स्वर्ग मिल गयौ.
उछर परौ. बोलौ, ये हुई न बात. ये है कविता.
मजा आ गया.
अब हमारी ऐसी हालत कि हँसें कि
रोमें. मगर हमनें इग्नोर कर दियौ. और भैया हम तौ कल कवि सम्मेलन मुसायरौ सुनवे जाय रहे हैं, आपके पास बखत होय तौ जरूर आइयो, मन दुरस्त है आवैगौ.
तन-दुरुस्ती के लिए वर्जिश है जैसे लाजिमी
मन-दुरुस्ती के लिए साहित्य सुनना चाहिए
नवीन सी चतुर्वेदी
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