ब्रजभाषा व्यंग्य – गणपति उत्सव या पार्टी

फैला दसों दिशाओं में जितना प्रकाश है

हर मन में जो बसा है उसी का प्रकाश है

 

घुटरू हमारे मुहल्ला में गणपति आये हैं?

 

का कहै बत्तो? गणपति आये हैं? मतलब अबतक गणपति कहूँ और रह रहे हुते? तेरे मुहल्ला में जो हर चौथ कों चोला चढ़ायौ जावै वौ कौन पै चढ़ायौ जावै? और जो भर-भर थार लडुआन के भोग लगें वे कौन कों लगें?

 

तू सीधी बात नाँय कर सकै का? उलटौ बोलवौ जरुरी है का? जैसें मुम्बई में गणपति बप्पा मोरिया होवै है नें वैसें ही अब हमारे गाम वारे हू गणपति बप्पा मोरिया मनायवे लगे हैं. खूब सुन्दर गणपति लामें. पिछली साल तौ चन्दा कम भयो सो बस पच्चीस हजार के ही लाये. अबकी बार पचास हजार के लाये हैं; और मण्डप हू अबकें भन्नाट सजवायौ है. मूजिक वारे सों हू कह दीनी है कि बोरिंग नाँय नए जमाने के तड़कते-फड़कते गाने लगावै.

 

बत्तो मैं यै कह रयो कि

 

अरे छोड़ तू का कहैगौ सब पतौ है. मैं जानों तेरी आदतन कों. लेक्चर देयगौ और का. अबकी बार डेकोरेशन बजट डबल है. चमाचम-लाईट और धमाधम-मूजिक बिना त्यौहार त्यौहार जैसौ लगै ही नाँय नें. चाय-नाश्ता वारे सों हू कह दीनी है कि दिन में जितनी बार चाय लगै देते जानों है, नो रोक-टोक. सवेरे-संजा के नाश्ता में रोज चाय-बिस्कुट नाँय, बदल-बदल कें नाश्ता आनों चैंयें. कभू समोसा कभू कचौरी कभू पकौरी, बदल-बदल कें. नो रिपीटेशन.

 

अरे बत्तो सुन तौ सही..

 

नाँय सुननी तेरी; और सुन छोरा-छापरेन की स्पेशल दवा की हू व्यवस्था है. दिनभर मेहनत करंगे, थक तौ जामंगे ही. तू समझ गयौ नें?

 

सब समझ गयौ तू जो कह रही है. एक बात बताय तोय पतौ है यै उत्सव कब, कौन नें और क्यों आरम्भ कियौ हुतो?

 

मैं इन सब बात’न में मूड़ नाँय मारों, अपनों सिद्धान्त तौ बस यै है कि नगाड़ा खड़का और अपुन फड़का.

 

नगाड़े खड़कवे पै तौ घोड़ा-घोड़ी हू नाचवे लगें, अपुन घोड़ा-घोड़ी हैं का? गणपति उत्सव मनाय रहे हौ यै तौ भौत ही बढिया बात है परन्तु तेरी बातन सों लग रह्यौ है कि उत्सव की आड़ में पार्टी की व्यवस्था है रही है. यै उत्सव आँखन कों खोलवे के लिएं आरम्भ भयौ हुतो, आँखन वारे सूरदास बनवे के लिएं नाँय. मेरी बात बुरी लगै तौ क्षमा कर दीजो परन्तु उत्सव कों उत्सव की तरें मनानों चैंयें, पार्टी की तरें नाँय.

 

भ्रम दूर कर न पाये वो खद्योत भी नहीं

आँखों को खोल दे वो ही सच्चा प्रकाश है

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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