हमें ये काम करना है गुरूजी
बत्तो कैसौ सुहानों समय हुतो, कैसे
बढ़िया लोग हुते, न अब वैसौ समय न अब वैसे लोग! बड़ी असानी सों दुर्दसा की हँड़िया नयी पीढ़ी
के मूड पै फोर दीनी जावै है जबकि या दुर्दसा के लिएं जवाबदार अपुन स्वयं हू हैं।
तोय याद है गुरू पूर्णिमा के महीनाभर पहलें सों ही प्लान बनवे लगते। गुरूजी की
पूजा कैसें करंगे, घर सों कब निकरंगे आदि आदि।
हाँ घुटरू सब याद है कैसें अपुन फल, फूलमाला, मिठाई आदि
खरीद कें लाऔ करते। सिदौसी जमना न्हाय्वे निकस जाते। अब तौ
जमना जी ऐसी रूठी हैं कि पूछौ ही मत. साँची कहों तौ जा दिना नाले जमना-गंगा में पधरायवौ सुरू भयौ अगर वाही दिना रोक
दिये जाते तौ आज यै हालत न होती।
सही बात है बत्तो। जमना-गंगा की तरें
फल-फूल हू अछूते नाँय रहे न फल, फल जैसे
लगें न फूल, फूल जैसे। रंग-रूप-स्वाद-गन्ध सब खोय गये। भोजन सौ आदमी’न के लायक है और पंगत
में हजार बैठ गये हैं। चार’न के कुकर्म’न की सजा चालीस भुगत रहे हैं। ताज्जुब यै
कि चालीस’न सों चार नाँय समारे जाय रहे।
का करें घुटरू जो आदमी स्वयं
यम-नियम-संयम कौ पालन नाँय कर पाय रह्यौ वौ दुसरे लोग’न सों का बोल पावैगौ।
जिन्हें देखते ही मन श्रद्धा सों झुक जाय ऐसे सन्त-जन हू तौ अब गिने-चुने ही रह
गये हैं। काहू सों छुपी थोरें ही है कि मार्कीट में कैसे-कैसे गुरू लोग आय गये हैं।
आदमी हू तौ फ्लेवर’न कौ प्रेमी है। यै आदमी खान-पान की तरें
हर युग में स्वादानुसार नये-नये गुरू’न के आविष्कार करतौ रहै।
हालत फिर वौही, करें चार और भुगतें चालीस।
बत्तो पुराण’न में लिखी है कि
भगवान फिर आमंगे। बस, अब तौ अपुन कल्कि-अवतार की प्रतीक्षा
करें, और संग में यै हू कि अवतार अपने घर में न है कें परौस
में होय। क्योंकि जा संसार नें राम-कृष्ण
जैसे’न कों सहजता सों नाँय कबूलौ वौ नये अवतार कों का योंही
स्वीकार कर लेयगौ? इतनों झंझट कौन मोल लेय? जो सबकी दसा वौ अपनी दसा! जब सब कौ भलौ है जायगौ, अपनों हू भलौ है जायगौ।
घुटरू मैं जानों तू कटाक्ष में बोल
रह्यौ है। मगर एक बात और है गोविन्द सों परिचय करायवे के लिएं योग्य गुरू हू तौ
चैंयें। आऔ पाखण्डी’न कों छोड़ कें योग्य गुरुजन’न की शरण गह कें निवेदन करें
हृदय-बगिया में अपनी ठौर दीजै
महक बनकर बिखरना है गुरूजी
नवीन सी.
चतुर्वेदी
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