थेँक्यु भैया घुटरू.
घुटरू तू या दुनिया में नाँय
रहै का? देख नाँय रह्यौ हर जगें थेँक्यु-थेँक्यु चल रयौ
है!
खूब देख रयौ हों, अपने’न कों जो दिनरात दुत्कारते रहें वे हु बिराने’न सों बिना मतलब थेँक्यु-थेँक्यु ऐसें कह रहे हैं जैसें गरीब-गुरबा’न कों खीचरी
बाँट कें पुन्न कमाय रहे होंय! अरे थेँक्यु कहवौ बढ़िया बात है मगर भेड़चाल में क्यों
शामिल होनों? तोय पतौ है यै थेँक्यु-थेँक्यु क्यों है रही है?
नाँय घुटरू मोय तौ नाँय पतौ तू
बताय.
सन 1621 की बात है. तब के प्लायमाउथ यानी अब के मैसाचुएट्स में वैम्पानोआग यानी अमेरिका के मूल
निवासी और इंग्लैण्ड सों आये भए प्रवासी’न के बीच एक अद्भुत घटना घटी. ठिठुरती ठण्ड और अकाल सों जूझ रहे प्रवासी’न कों वहाँ के मूल निवासी’न नें
स्थानीय स्थिति के अनुसार खेती करवौ सिखायौ. पहली फसल जब हाथ
में आयी तौ प्रवासी समुदाय नें उत्सव आयोजित करकें मूल निवासी’न के प्रति आभार व्यक्त
कियौ. कालान्तर में यै थेंक्स गिवन डे के रूप में प्रतिष्ठित
भयौ और अब दुनिया भर में हर साल नवम्बर के चौथे गुरूवार कों मनायौ जावै. अब समझी? नकल करवे सों पहलें अकल कौ इस्तेमाल तौ कर!
अरे वाह यै तौ भौत बढ़िया बात
है; मगर ऐसौ अपने यहाँ क्यों नाँय होवै?
फिर वौ ही बात घर कौ जोगी जोगना
आन गाम कौ सिद्ध! होवै क्यों नाँय नें, बिल्कुल होवै
है. अपनी परम्परा’न कों गुनौगे तब तौ समझौगे. आभार प्रकट करवे में अपुन सदैव अग्रगण्य
रहे हैं. व्यक्ति छोड़
अपुन तौ प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करवे वारे लोग हैं. अपने
यहाँ जो संक्रान्ति, पोंगल, लोहड़ी,
बिहू आदि मनाये जामें, ये सब का हैं? इन पर्व’न
के माध्यम सों अपुन प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करें. अपने
यहाँ हू सब कछ है, अगर नाँय नें तौ बस देखवे की दृष्टि और समझवे
की इच्छाशक्ति नाँय नें. हर बार ठठ्ठा मार कें हँसवे की जगें
कभू-कभार सोच विचार हू कर लैनों चैंयें. अरे दूसरे लोग’न की अच्छी बात सीखौ, बढ़िया है,
मगर अपनी अच्छाइय’न सों म्हों क्यों फेरनों? यै तौ वैसौ ही भयौ कि आंटी’न
के तौ चरण चाँपने मगर मैया कौ म्हों हू न देखनों! अपनी भाषा-बोली सों परहेज और अन्य भाषा’न की
आरती उतारनों! वैसौ ही है अपने’न कों दुत्कारनों और बिराने’न सों थेँक्यु-थेँक्यु कहते डोलनों! सोचौ, सोचवौ भौत जरूरी है.
सोचौगे तभी तौ समझौगे!
सोचना भूलने लगे हैं हम
वक्त रहते उपाय सोचा जाए
नवीन सी चतुर्वेदी
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