ब्रजभाषा व्यंग्य – पितर पक्ष के बहानें

 कहूँ-कहूँ ही परम शुद्ध वस्तु टिक रई हैं

नदी किनारें हू पानी की कैन बिक रई हैं

 

सच्ची बात है। जिन नदी’न के किनारें मानव सभ्यता बसवौ आरम्भ भयौ हुतो आज विनके पानी पीवे का नहायवे लायक तक नाँय रहे। यै सब तौ ठीक अब तौ पितर पक्ष आय रह्यौ है। लुगैया’न के नसीब में चैन नाँय नें घुटरू। पहलें सावन के सोमवार, राखी, हरियाली तीज, नागपंचमी, जनम अष्टमी, राधाअष्टमी और अब कनागत, एक के बाद एक। सरीर हल्ल है जावै। अब एक-एक कर कें पुरखा आमंगे। विनके सराद्ध करौ। कभू खीर बनैगी कभू श्रीखण्ड। चरूली, चटनी, सौंठ, दहीबड़ा, पूरी, कचौरी के संग सूखे और पतरे साग तौ बनने ही हैं। मरी कामवारी हू इन दिन’न में नखरे करवे लगें। काम बढ़ौ भयौ दीखै तौ बहाने बनाय कें छुट्टी लै लेमें।

 

सही कह रही है बत्तो। परिपाटी चली आय रही है सो अपुन कों हू माननों ही है। सराद्ध हू अब पहले जैसे नाँय रहे, भौत महँगे है गये हैं।  परन्तु जो है सो है। अपने पुरखा’न की सेवा अपुन नाँय करंगे तौ कौन करैगौ? मेहनत और खरचा तौ ठीक लेकिन समस्या यै है कि अब श्राद्ध में जिमायवे कों शुद्ध का सामान्य  ब्राह्मण तक नाँय मिलें!

 

हाँ घुटरू अब ब्राह्मण’न के हू टोटे है गये हैं। जाय नौतौ वौही कहै आप टिफिन दे देना। अरे भैया टिफिन दे देना मतलब यै तौ उधार चुकायवे जैसौ है गयौ। आयवे जायवे कौ ऑटो भाड़ौ देउ, कपड़ा देउ, यथाशक्ति दक्षिणा देउ और ब्राह्मण बैठ कें भर पेट खावै हू नाँय। पुरखा’न की छोड़ खुद्द अपनों हू मन तृप्त नाँय होवै।

 

बत्तो ब्राह्मण’न के जैसें ही गऊग्रास हू एक विकट समस्या बन गयी है। अव्वल तौ गैया मिलें नाँय नें। मिल जामें तौ विनके मालिक’न के नखरे। वाके बाद हू गैया गऊग्रास खामें नाँय नें। म्हों फेर लेमें हैं। देख कें माथौ ठनक जावै कि हम वौ खाय रहे हैं जाकों जानवर तक नाँय खाय रहे! बढ़ती भयी जनसंख्या नें सच्चऊँ कण-कण में विष घोर दियौ है। सिस्टम कालीदह जैसौ है गयौ है। द्वापर में जैसें कालिया नाग कों नाथ कें जमना के प्रदूषित पानी कों शुद्ध कियौ हुतो फिर सों कृष्ण ही अवतार लै कें हमें या सिस्टम की गन्दगी सों बाहर निकार सकें।

 

सही कह रह्यौ है घुटरू। शुद्धता के तौ अब सपने ही हैं। एक जमानों हुतो कि इमरती खायवे कों मन ललचाउ करतो, मगर अब तौ

 

न स्वाद है न ही रस है न कुरकुराहट है

न जानें कौन विधी सों इमरती सिक रई हैं

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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