ब्रजभाषा व्यंग्य – खट-मिट्ठौ व्यंग्य

 गुरूजी नैंक फ्री होउ तौ एक बात पूछों? घुटरूमल जी नें पूछी तौ ऐसें जैसें कि वे हमारी अनुमति लै कें ही प्रश्न पूछवे वारे होंय! याद नाँय आवै कि इननें कभू इतनों पेशंस दिखायौ होय।

वैसें हू मन की बात करवे वारे कब काहू सों पूछ कें अपने मन की बात करें! विनें तौ बस अपने मन कों खाली करवे सों मतलब। नेता हू कब पूछ कें भाषण देमें, जो मन में आवै, बोल मारें। एक जमानों हुतो जब नेता’न कों सुनवे के लिएं लोग घण्ट’न इंतजार कियौ करते। अब तौ हाल यै है कि ऑर्डर दै कें स्रोता बुलाने परें।

 

कल मुम्बई लोकलट्रेन में व्यापारी बतियात हुते “यार हद है धन्धा करें या इनकी फरमाइशें पूरी करें। फोन आया है - साहब आ रहे हैं। बस भर भर कर वर्कर्स भेजो। बता यार प्रोडक्शन बन्द कर के वर्कर्स को साहब का भाषण सुनने भेजें? बिरयानी तो साहब का कोई दूसरा सेवक खिला ही देगा मगर साहब का भाषण सुनने वाले को भाषण सुनने की पगार कौन देगा? कुछ वर्कर तो ढीठ हो गये हैं। क्यों न हों कोई न कोई साहब आता रहता है और हम फेक्ट्री वालों को वर्कर भेजने ही पड़ते हैं। नेता लोग आने में और भाषण देने में टाइम लगा ही देते हैं। ढीठ वर्कर इसको ओवरटाइम गिना डालते हैं। हम व्यापारियों की तकलीफ कोई समझता ही नहीं है।“

 

बताऔ हम हू मन की बात सुनते-सुनते कहाँ सों कहाँ पहोंच गये। चैतन्यावस्था में लौटते भए देखौ कि घुटरूमल जी हमें झकझोर कें पूछत हुते गुरूजी आप सुन नाँय रहे, मेरौ प्रश्न है कि व्यंग्य के जो अनेक प्रकार होमें हैं जैसें कि तीखौ व्यंग्य, चिरपिरौ व्यंग्य, खट्टौ व्यंग्य, कड़वौ व्यंग्य, मीठौ व्यंग्य आदि-आदि ऐसें ही सुन्यौ है कि व्यंग्य खट-मिट्ठौ हू होवै है! यै भला कौन सौ प्रकार है? बतायवे की कृपा करौ।

 

घुटरूमल जी कौ प्रश्न सुन कें हम फिर सों खयाल’न में खोय गये। याद आयौ वे व्यापारी आगें बोल रहे हुते “यार राजनीति में अब किससे क्या कहें समझ में नहीं आता।  बांग्लादेश और मुर्शिदाबाद की खबरों ने हिलाकर रख दिया है। सच कहूँ जो लोग भाईचारा-भाईचारा करते रहते हैं न उन सभी के सभी को सपरिवार, -व्यापार ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में शिफ्ट कर देना चाहिए।“

 

पुनः चैतन्य में लौटते भए हमनें पायौ घुटरूमल जी पूछत हुते गुरूजी बताऔ नें खट-मिट्ठौ व्यंग्य कैसौ होवै है?

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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