ब्रजभाषा व्यंग्य – नोटा

 घुटरूमल जी नें पूछी गुरूजी यै नोटा क्या बला है? हमनें कही प्रभु चुनाव’न की दृष्टि सों तौ “नन ऑफ द अबव” मतलब NOTA और सामान्य शब्द’न में कहें तौ गाँधी जी के तीन बन्दर’न की तरें तटस्थ है जानों यानि नोटा।  हालाँकि वर्तमान व्यवस्था के अनुसार नोटा के वोट हार जीत की गिनती में वैसें ही नाँय गिने जामें जैसें जुग्ग’न सों रोती बिलखती जनता कौ कष्ट, कष्ट मानों ही नाँय जाय रह्यौ। मगर हाँ नोटा की बढ़ती संख्या या बात की गारण्टी है कि आज नाँय तौ कल वो सुबह कभी तो आयेगी।

 

राजनीति के बाहर देखें तौ नोटा जीवन में यत्र तत्र सर्वत्र व्याप्त है। भिन्न-भिन्न देश, काल, वातावरण, परस्थिति आदि में नोटा के भिन्न-भिन्न स्वरूप देखे जाय सकें। उद्योग जगत में जब एक संग हजार’न कों नौकरी सों निकारौ जावै तौ बाकी बचे लोग नोटा कौ बटन दबाते जैसे ही लगें हैं।  सभा, सोसायटी, घर, कुनबा’न में तौ नोटा रूटीन जैसी बात है। दो देस एक दूसरे पै बम बरसाय रये होंय, दर्जन भर देस डी बेटा डी कर रहे होंय, निर्दोस लोग’न की दुनिया उजड़ रही होय और शेष विश्व होरी, दिवारी, क्रिसमस, ईद मनाय रह्यौ होय तौ यै हू नोटा कौ एक प्रकार मानों जाय सकै। संसार कों कोरोना की भट्टी में झोंकवे वारे चीन के सामनें दुम हिलातौ भयौ विश्व हू नोटा कौ बटन ही दबाय रह्यौ है।

 

लिटरेचर, आर्ट, स्पोर्ट्स, एज्युकेशन, साइंस आदि आदि कहूँ जाऔ जहाँ-जहाँ कोटा है वहाँ-वहाँ नोटा है। राजनीतिक पार्टी’न की आन्तरिक राजनीति के मूकदर्शक हू नोटा दबाते भये से ही लगें हैं। रामचरित मानस में कैकेयी सों मन्थरा कौ कहनों “कोउ नृप होय हमें का हानी” या द्रौपदी चीर हरण पै मनीषी’न कौ मौन या धू धू कर कें जरते भए सहर की छाती पै नीरो की बजती बाँसुरी; ये सिगरे प्रसंग नोटा की श्रेणी में ही आमें हैं।

 

ऐसे एक नाँय अनेक’न प्रसंग हैं। परन्तु घुटरूमल जी या ब्रह्माण्ड में प्रकृति-परमेसुर के बाद एकमात्र मनुष्य ही ऐसौ जीव है जो हर संकट कौ समाधान खोज ही लेवै है। जब मानव नें देखी कि नोटा की प्रवृत्ति कछू जादा ही बढ़न लगी है तौ वानें ताबड़तोब अनेक’न योजना’न कौ नाम दै कें नोटा के सामनें  नोट’न की लॉलीपॉप रख दीनी और जनता जनार्दन के हाथ में आये एक धारदार अस्त्र की धार कुन्द हैवौ स्टार्ट है गयौ। बोलौ सत्य नारायण भगवान की …….

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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