ब्रजभाषा व्यंग्य – शुभचिन्तक

तुम का समझे बरसाती नालौ है यह

ब्रजभाषा रत्नाकर सागर जैसी है

 

ऑफिस नाँय गयौ घुटरू? तबियत तौ ठीक है नें ? कछू काम-वाम आय गयौ का?

 

नाँय बत्तो ऐसी कछू बात नाँय नें। आज बॉस कौ वर्क फ्रॉम होम कौ मूड हुतो सो मैंनें हू बहती गंगा में हाथ धोय लिये; और बताय कैसें याद कियौ?

 

घुटरू एक प्रश्न है यै जो लोगबाग एक-दूसरे सों कहते रहें कि “हम आपके शुभचिन्तक हैं” या “आप हमारे शुभचिन्तक हैं” ये लोग वास्तव में एक-दूसरे के शुभचिन्तक होमें हैं का?

 

बत्तो सिद्धान्त तौ यही कहै कि बी पॉजिटिव, सकारात्मक रहौ! भलें ही सबकी टाँग खेंचते या खिंचवाते रहौ मगर सज्जनता कौ ड्रामा करते रहौ! भलें ही चमच’न सों घिरे रहौ मगर “निन्दक नियरें राखियै” जैसे उपदेस देते रहौ!

 

घुटरू सिद्धान्त छोड़ तू ब्यौहार की बात बताय, का लोग सच में एक-दूसरे के शुभचिन्तक होमें हैं?

 

बत्तो यै तेरी भौत बुरी आदत हैतू हलक में अँगुरिया डार कें हकीकत उगलवाये बिना मानें नाँय नें। देख भेंन “सत्यं वद प्रियं वद” कौ सिद्धान्त ही ठीक है। भलें ही आदमी कों सपत्तौ डकार जाउ मगर अहिंसावादी बने रहौ!

 

घुटरू घुमाय कें मत बोल सीधी बात बताय।

 

बत्तो “मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में” के अनुसार कभूकभार आत्मचिन्तन हू कर लेउ कर!  हमेसा मोसों ही क्यों पूछै? अब पूछी है तौ सुन, लोग एक-दूसरे के शुभचिन्तक अवश्य हैं मगर सुविधा के अनुसार! बाढ़ में फँसी बन्दरिया की कहानी याद कर।  गाम में बाढ़ आयी। सब परेशान। बन्दरिया अपने बच्चा कों बचायवे के लिएं सबते बड़े पेड़ पै चढ़ गयी। बाढ़ कौ पानी बढ़न लगौ। बन्दरिया पेड़ की और ऊपर वारी डाली पै चढ़ गयी। पानी और बढ्यौ बन्दरिया और ऊपर चढ़ी। पानी और बढ्यौ वानें बच्चा कों गोदी में लै लियौ। पानी और बढ्यौ वानें बच्चा कों कन्धा पै बैठाय लियौ। पानी और बढ्यौ वानें बच्चा कों मूँड़ पै बैठाय लियौ। और जब पानी नाक सों ऊपर जायवे लग्यौ….

 

हाँ घुटरू, जब पानी नाक सों ऊपर जायवे लग्यौ तब का कियौ बन्दरिया नें?

 

बच्चा कों नीचें रख कें बन्दरिया वाके ऊपर खड़ी है गयी! हम सब एकदूसरे के शुभचिन्तक हैं मगर सुविधा के अनुसार! लेकिन बत्तो जैसें यै एक कटु-सत्य है, वैसें ही दूसरौ ध्रुव-सत्य यै हू है कि मनुष्य मनुष्य सों प्रेम करतौ रह्यौ है, कर रह्यौ है और करतौ रहैगौ क्योंकि

 

न जाने कब का ये सारा जमाना मिट चुका होता

अगर इन्सान को इन्सान से निस्बत नहीं होती

 

नवीन सी चतुर्वेदी

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