ब्रजभाषा व्यंग्य – मुफत कौ चन्दन

 घुटरूमल कभू-कभू थोड़े जादा ही सेंटी है जामें। सामान्य सी लगवे वारी बात’न पै हू विचलित है जामें । आज बोले गुरूजी समझ नाँय आवै लोग पच्चीस-पचास रुपैया बचाय कें कौन सौ तीर मार लेमें हैं?

 हमनें पूछी भैया, भयौ का बताऔ तौ सही तौ बोले अपनों मित्र है नें छुटल्ली कल वा के संग लॉन्ग ड्राइव पै गयौ हुतो। बढ़िया गाड़ी खरीदी है वा नें, होयगी कोउ बीस बाईस लाख की। सुनी है कि पैट्रोल हू खूब पियै। हमनें कही मुद्दा पै आऔ, बात बताऔ। वे बोले टोल नाका पै जैसें ही सटकवे कौ मौकौ मिलौ गाड़ी दौड़ाय दीनी। पचास रुपल्ली टोल बचाय कें ऐसें खुस भयौ जैसें लॉटरी लग गयी होय। गाड़ी खरीदवे कों लाख’न हैं, पैट्रोल फूँकवे कों हजार’न हैं बस टोल के पचास रुपैया मारने हैं!

 

हमनें कही याही सों कहें मुफत कौ चन्दन घिस मेरे नन्दन। अपवाद छोड़ देंय तौ जिनें-जिनें मौके नाँय मिलें वे ही स्वयं कों ब्रह्मचारी सिद्ध करते डोलें। मुफत के चन्दन कौ लाभ लैवौ हमारौ राष्ट्रीय स्वभाव है। पानीपूरी के ठेला पै खड़े है कें देखौ। पानीपूरी वारौ एक्स्ट्रा पूरी दै देय वाके बाद हू कछू लोग-लुगैया एक और  पानीपूरी माँगते देखे जाय सकें।

 

आप कवि सम्मेलन-मुसायरे’न में तौ गये ही होउगे। स्टेज सजायवे पै खर्चा करंगे मगर स्टेज की सोभा बढायवे वारे’न पै नाँय।  साउण्ड-सिस्टम पै खर्चा करंगे मगर जिनकी साउण्ड सुननी है विनपै नाँय। वीडियो, फोटोग्राफी विज्ञापन, पैम्पलेट, पोस्टर, चाय-पानी बल्कि कहूँ-कहूँ तौ डिनर तक की व्यवस्था  होवै परन्तु जो कविता मानव कों मानव बनावै वा कविता के सर्जनहार मानव के प्रति वास्तविक मानवीय सम्वेदना दीखवे में नाँय आवै।

 

मुफत कौ चन्दन घिसवौ हमारौ राष्ट्रीय स्वभाव है। या कौ बुरौ नहीं माननों चैंयें। ऐसौ एक और उदाहरण देखौ । हमारे पत्र-पत्रिका वारे हू कम नाँय नें। कागज के लिएं पैसा हैं, स्याही के लिएं पैसा हैं, दफ्तर-कर्मचारी-बिजली-पानी आदि-आदि-इत्यादि सबके लिएं पैसा हैं। डिस्ट्रीब्यूशन वारे’न के लिएं हू पैसा हैं। पढवायवे वारे’न की तौ कीमत है मगर जिनके लिखे कों पढ्यौ जाय रयौ है विनकी न तौ कोउ बखत है, न कदर, न कीमत। अपवाद स्वरूप कहूँ-कहूँ कीमत होवै हू तौ चना-मुरमुरा की तरें। मगर या कौ बुरौ नाँय माननों चैंयें। मुफत के चन्दन कों घिसवौ हमारौ राष्ट्रीय स्वभाव है और प्रभु मिल जाय तौ फ्री कौ माल कौ’नें बुरौ लगै? हम तुम फ्री के वीडियो डाऊनलोड नाँय करें का? या मारें भैया सेंटी भए बिना हमारे संग बोलौ सियावर राम चन्द्र की ….

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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