वैलेंटाइन स्पेशल, जहाँ न पहुँचै रवि – ब्रजभाषा व्यंग्य

 घुटरू भैया, कल हमारे मुहल्ला में दो घटना घटीं! पहली तौ यै कि हमारे यहाँ वेलेंटाइन ईवेंट हुतो सो एक कवि जी कों बुलायौ, बिचारे आये हू मगर एक तौ कहूँ सों फ्री की चढ़ायें भये, दूसरें अमावस्या की रात और तापै गटर कौ ढक्कन खुल्यौ भयौ; सो भैया घुटरू, जहाँ न पहुँचै रवि, वहाँ पहुँच गये कवि!

 अब दूसरी घटना सुन! कवि नाँय पहुँचे तौ ईवेंट कैसें होय? तैंनें बे-गम नस्तर कौ नाम तौ सुनों ही होयगौ? वौ’ही जो दूसरे’न की सायरी सुनाती फिरै! जैसें ही पतौ चलौ, बिना बुलाएं आय टपकी! दूसरे’न के सेर अपने नाम सों सुनाय-सुनाय कें वाहवाही तौ लूटी ही, लटके-झटके दिखाय कें लिफाफौ हू झटक लियौ! या तरें जहाँ न पहुँचै कवि, वहाँ पहुँच गये अनुभवी!

 

भेंन बत्तो, अब आगे की सुन, जहाँ न पहुँचै अनुभवी, वहाँ पहुँचै विप्लवी! ये विप्लवी प्राणी हर युग में पैदा होते रहे हैं! जैसें पानी रस्ता ढूँढ लेवै, वैसें ही विप्लवी हू विप्लव के मौके तलास ही लेमें हैं! आजकल वेलेंटाइन के ज्वार-भाटा चल रहे हैं! ऐसे में विप्लवी क्यों चूकें! तैंनें वौ रील तौ देखी ही होयगी जामें “फरवरी की सजावट, पति के रोमान्टिक मूड और संक्रान्ति” की बात है! इत्तौ ही नाँय असली विप्लव तौ वा रील नें मचाय रखौ है जामें “गुलाब-सप्तमी, भालू-दसैरा, आलिंगन-द्वास्सी, चुम्बन-त्रयोदसी और प्रेम-चतुर्दशी की चर्चा है”!

 

हाँ भैया घुटरू, ये सिगरी रील देखी हैं मैंनें! सिगरी मजेदार हैं! मगर एक बात मैं नाँय समझ पाय रही कि आदमी ऐसे विप्लव करै क्यों हैं?

 

भेंन बत्तो, याकौ कारण है! गान्धी जी पैदा भये ता पहले सों आदमी गान्धी जी के तीनों बन्दर’न कौ रॉल अकेलौ ही निभाय रह्यौ है! आँखें हैं, दिखाई हू परै मगर देखवे पै पाबन्दी! कान हैं, सुनाई हू परै मगर सुनवे पै पाबन्दी! म्हों है, बोलवौ हू जानें मगर बोलवे पै पाबन्दी! अरे आदमी सों जादा आजाद तौ पिंजरा के पंछी हैं! बस उड़ान ही पै पाबन्दी है, चहचहायवे और पंख फड़फडायवे पै कोउ पाबन्दी नाँय नें! अब तू ही बताय, नाना-भाँति के जंजाल’न में फँसौ भयौ यै आदमी थोरे-भौत विप्लव यानि मनोरंजन कर कें अपनों और दुसरे’न कौ जीउ हलकौ न करै तौ का करै? भेंन बत्तो मैंगो-पीपल यानी आम-आदमी के जीवन कौ सार सुन

 

हम अपने दर्द को कुछ इस तरह भुलाते हैं

खुद अपने आप ही अपना मजाक उड़ाते हैं

कमाल ये नहीं कि सह रहे हैं जुल्मो-सितम

कमाल ये है सितम सह के मुस्कुराते हैं

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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