ब्रजभाषा व्यंग्य – अँगूठा छाप

खूब थी वो मक्कारी खूब ये छलावा है

वो भी क्या तमाशा था ये भी क्या तमाशा है

 

अरी भेंन बत्तो का भयौ?  काय कों खूँटा सों उखरी परी है? घण्टा भर है गयौ, चुप्प ही नाँय है रही! कोउ तेरी भैंस खोल कें लै गयौ है का? भयौ का है नैंक बताय तौ सही!

 

अरे भैया घुटरू बात ही ऐसी है, का बताओं, ये नासपीटे झुमरीतलैया सुधार समिति वारे आये हुते। आय कें पूछी घर में कौन-कौन हैं? का काम करें? कितने पढ़े भए हैं? बगैरै-बगैरै। मैंनें कही कि भैया हमारे जमाने में भौत पढ़ाई-लिखाई होती नाँय नीं, सो मैं तौ बस पाँचवी पास हों। तौ मरौ यों बोलौ कि पाँचवी पास तो अँगूठा छाप बराबर होते हैं।

 

वाकी इत्ती हिम्मत? तोय अँगूठा छाप बताई? फिर तैंनें का कही?

 

ऐसौ फफेरौ है ऐसौ फफेरौ है कि वाकी सात पुस्त याद करंगी। पाँचौ कपड़ा पिराय कें ऊपर सों आरतौ हु उतार दियौ। मोसों अँगूठा छाप कह रह्यौ हुतो, मो सों! मैंनें पूछी बेटा रे नैंक बताइयो सात ढैया कित्ते होमें? बगल झाँकवे लगौ। फिर कही ढैया, ड्यौढा, सवाई, अद्धा, पौना तौ का पतौ होंगे चल तू बस्स तेरह का पहाड़ा ही सुना दे, वौ यै हु नाँय सुनाय पायौ।

 

मतबल उलटे बाँस बरेली वारौ सीन?

 

हाँ और नाँय तौ का, मोसों अँगूठा छाप कह रह्यौ हुतो। मैंनें वाय इत्ते पै ही नाँय बखसौ, वाकी आगें हू रेल बनाई। या के बाद मैंनें वा सों पूछी लाला रे तेरे पास जो यै फटफटिया है यै तैंनें बिना लोन के लीनी है या लोन पै। वौ बोलौ लोन पै। फिर मैंनें पूछी लोन के कागजात पढ़े होंगे? वौ बोलौ मैडम आजकल कौन पढ़ता है लोन के डॉक्युमेंट्स? एक तो इतने सारे पेज होते हैं वो भी छोटे-छोटे अक्षरों में, कोई पढ़ना चाहे तो भी न पढ़ पाये, इसलिए लोगबाग अब केवल जहाँ-जहाँ क्रॉस का निशान होता है न, बस वहाँ-वहाँ साइन कर देते हैं। मगर आप ये क्यों पूछ रही हैं? तब मैंनें कही बेटा रे असली अँगूठा छाप तौ तू भयौ।

 

अरे बत्तो यै तैंनें का कह दीनी! दुखती रग पै हाथ रख दियौ, जखम’न पै नमक बुरक दियौ, कहवे सुनवे में अटपटौ लगैगौ मगर कड़वी हकीकत यै ही है कि आज घर घर में अँगूठा छाप भरे परे हैं।

 

दूर की तो क्या कहिए पास का नहीं दिखता

गर यही उजाला है तब तो ये भी धोखा है

 

नवीन सी. चतुर्वेदी


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