बत्तो याद है बचपन में साईंबाबा, काली माई, भैरोंबाबा
आदि-आदि नाम’न ते पर्चा बँटते। कभू-कभू
बस-अड्डे ताँगे-अड्डे या रेलवेस्टेशन पै हु पर्चा बाँटे जाते। याद आई तोय?
हाँ घुटरू याद आई विन पर्चा’न में लिखौ होतो कि फलानी-फलानी
जगें फलाना-फलाना चमत्कार हुआ है। फलाने
ने पर्चे बाँटे तो उसकी मुराद पूरी हो गयी! जो कोई अपनी मुराद पूरी करना चाहे वो फौरन
वहाँ जाकर ढोक लगाए। जो नहीं जा सके वो इन पर्चों को छपवा कर बँटवाए। ऐसा करने वाले
की माँगी हुई मुरादें फौरन पूरी हो जायेंगी। आदि आदि इत्यादि।
हाँ बत्तो और विन पर्चा’न के लास्ट में धमकी और लिखी रहती कि
जो भी इसका भरोसा नहीं करेगा, मजाक उड़ायेगा
या बुराई करेगा; उसका ये हो जायेगा वो हो जायेगा आदि आदि इत्यादि।
और घुटरू वा डर के मारें भले-भले पढ़े-लिखे लोग हू छपवाय-छपवाय
कें पर्चा बाँटत फिरौ करते। विनकी मुराद पूरी भयीं कि नाँय राम जानें और जिननें मजाक
उड़ाये विनके नुकसान भये कि नाँय यै हू राम ही जानें लेकिन एक बात जरूर साबित होवै
कि आदमी भलें ही खुद्द कों अत्ते-खां समझतौ होय मगर है एक नम्बर कौ डरपोक।
हाँ बत्तो तू शत प्रतिशत सही कह रही है। आज ते नाँय सनातन
काल सों डरपोक हैं अपुन लोग। वाराह और नृसिंग भगवान नें खुल कें बतायौ कि न
हिरण्याक्ष सों डरवे की जरुरत है न हिरण्यकशिपु सों! भगवान राम नें बताई कि न
परशुराम सों डरवे की जरुरत है न रावण सों! बंसी के बजैया कन्हैया नें बताई न
इन्द्र सों डरवे की जरुरत है न कंस सों! बाद में हू अनेक’न महा-मानव’न नें बारम्बार
हमें बतायौ कि “डरो मत, डर के आगे जीत है” मगर अपुन घर के
शेर गली के फलाने इत्ती सीधी-सच्ची बात कों समझें तब नें!
आजकल के जमाने में हु साँचे धरम कों खूँटा पै टाँग कें गुमरही के खेल धड़ल्ले सों खूब चल रहे हैं। अलग-अलग
धर्म’न के लोग’न के लिएं अलग-अलग वैरायटी के तमासे हैं और लोग विन तमासे’न कों टिकट लै-लै कें देख हू रहे हैं! इतनों पढ़-लिख जायवे के बाद हू आदमी रह्यौ
कुआँ कौ मेंढक ही! यै ऐसी-वैसी नाँय भयंकर समस्या है! बात
कडवी है मगर सत्य है कि अखिल ब्रहमाण्ड में हरेक जगें डर पसरौ भयौ है; जहाँ-जहाँ
आदमी डर रह्यौ है, वहाँ-वहाँ ही मर रह्यौ है।
ध्रुव सनातन सत्य है कुछ भी नहीं इसमें नया
सीधी सच्ची बात है जो डर गया वो मर गया
नवीन सी. चतुर्वेदी
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