घुटरू आज तौ सब जगें चुनावी चर्चा चल रही हैं और तू है जो किताब लै कें बैठौ भयौ है! का पढ़ रयौ है?
पास के सम्बन्ध फीके लग रहे हैं
दूर वारे ढ़ोल नीके लग रहे हैं
हाँ घुटरू एकदम खरी-खरी, दूर के ढोल ही सुहाने लगें! यै ब्रजगजल मैंनें हू पढ़ी है, आगें देख, धन की भूख आदमी कों कहाँ तक लै आयी है -
धन-बिमार’न
की दवा-दारू की खातिर
हाल के बच्च’न कें टीके लगे रहे हैं
और बत्तो काबिल व्यक्ति’न कों टोटली इग्नोर कर कें ना-काबिल’न की आरती उतारवे वारे’न पै यै टिप्पणी
देख -
जर रही है जोत वा कों कौन पूछै
चक्क जयकारे ‘बुझी’ के
लग रहे हैं
सही है घुटरू और आदमी की पाशविकता की पराकाष्ठा पै यै सेर सुन -
ऐसी बन्दर-बाँट बन्दर हू लजामें
सब स्वजन सुग्रीव ही के लग रहे हैं
सच्चऊँ आदमी नें अपने पुरखा बन्दर कों हू पीछें छोड़ दियौ है! और यै देख बत्तो जो काम एक जमाने में मुफत जैसें है जाउ करते, आज विनके लिएं हर महीना हजार’न फूँके जाय रहे हैं -
नाम अंग्रेजी भलें ही क्रीम कौ है
लेप तौ बेसन-दही के लग रहे हैं
लास्ट में भक्ति कौ दिखावौ करवे वारे’न कों हू नाँय बखसौ गयौ, विनें हू लपेटे में लै लियौ है घुटरू, यै सेर सुन -
मन में कछ श्रद्धा हू है या मन्दिर’न में
मात्र चक्कर मूरती के लग रहे हैं
घुटरू एक बात बताय, तोय नाँय लगै कि ये सब टिप्पणी अपुन दौनों’न पै हू लागू होमें हैं?
बत्तो, मात्र अपुन दौनों पै ही नाँय, सर्वसामान्य यानि या गजल कों लिखवे वारे पै हू लागू होमें हैं! का करें भेंन बत्तो, कस्तूरी तौ नाभि में है मगर अपुन सब हैं कि भटकें ही जाय रहे हैं!
अपनी जड़’न कों, अपने गाम’न सों का उखड़े; बन-बन के बछरा बन कें रह गये हैं अपुन सब! हकीकत तौ यै ही है कि
किसके सर पर ठीकरा फोड़ें अब इस भटकाव का
दूर की हर चीज को आला समझ बैठे थे हम
नवीन सी चतुर्वेदी
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