घुटरूमल जी गुनगुनाय रहे हुते इसारों को अगर समझो राज को राज रहने दो। हमनें पूछी तौ विननें बतायी गुरूजी आपकों अपनी झुमरीतलैया की समाजसेवी-संस्था ‘जीव-जन्तु सेवा-संघ’ याद होयगी। मनुष्य, पशु, पक्षी यानि समस्त जीव-जन्तु’न की सेवा में सदा तल्लीन, बल्कि सबसों आगें।
संस्था के सदस्य अपनी-अपनी जेब’न सों पैसा डार कें संस्था चलाऔ करते। फिर अचानक एकदिन कछु लोग बोले भैया अपनी जेब’न सों कबतक डारें अब लोग’न सों माँगौ। विनकी माँगवे की माँग जब ठुकराय दीनी गयी तौ विननें नयी संस्था बनाय दीनी ‘जनवादी जीव-जन्तु सेवा-संघ’।
असन्तुष्ट लोग कभू कहूँ पै
हु अधिक समय तक इकट्ठे रह नाँय सकें। कछु दिन बाद या नयी संस्था में फिर सों विरोध
के स्वर उठे कि भैया कबतक सेवा करें अब कछु मेवा हु मिलनी चैंयें। साब फिर एक नयी संस्था
कौ गठन भयौ और नाम रखौ गयौ ‘समाजवादी जीव-जन्तु सेवा-संघ’।
जिनें बिना मतलब सोते जागते
इन्कलाब-जिन्दाबाद रटते रहवे कौ मरज है गयौ होय वे न
तौ स्वयं चैन सों रहें न और’न कों चैन सों रहन देमें। अबके आन्दोलन की माँग हुती
कि भैया जो मेवा आय रही है वौ सबमें बराबर बँटनी चैंयें। लो साब एक और नयी संस्था
बन गयी ‘समतावादी जीव-जन्तु सेवा-संघ’।
कछु लोग दैवे कों जनम लेमें
और कछु लैवे ही लैवे कों। घुटरूमल जी आगें बोले हालाँकि आज हु दुनिया में भौतेरे अच्छे लोग हु हैं परन्तु बहुधा
सार्वजनिक-सेवा-क्षेत्र में ऐसे लोग अधिक दीखें जो दैवे कों नाँय, लैवे कों अवतार लेमें हैं। भौतेरे लोग ऐसे हु दीखें जो सहस्रबाहु समान
होमें। हाथी के दाँत’न की तरें विनके दीखवे वारे दो हाथ तौ हमेसा दान ही करत रहें
परन्तु अदृश्य सहस्रभुजा’न सों वे निरन्तर नाना प्रकार की मलाई’न कों चीरते रहें।
ऐसे लोग’न के चेला-चपाटे नयी बात लै कें आये कि भैया मेवा बँटन लगी यै तौ ठीक अब अनुसासन पै
हू विचार होय। सब जने बोलंगे तौ सुनैगौ कौन? माइक तौ गिने-चुने
लोग’न के हाथ’न में ही रहनों चैंयें। केवल आदर्श व्यक्ति’न कों ही मंच पै बिठायौ
जाय। साब एक और नयी संस्था बन गयी ‘आदर्शवादी जीव-जन्तु सेवा-संघ’।
घुटरूमल जी बोले गुरूजी अब
कछू लोग’न कौ कहनों है कि यै नाम बड़ौ ही अटपटौ सौ लगै सो या में सों जीव-जन्तु निकार कें केवल ‘आदर्शवादी सेवा-संघ’ नाम कर
दैनों चैंयें। हमनें पूछी जिन के लिएं संस्था बनी हुती विन जीव-जन्तु’न कों ही हटाय देउगे तौ बचैगौ का? कौन की सेवा करौगे और किन आदर्श’न
की दुहाई देउगे? यै सुनकें घुटरूमल जी मुस्कुराते भए फिर सों गामन लगे इसारों को
अगर समझो राज को राज रहने दो।
नवीन सी. चतुर्वेदी
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