ब्रजभाषा व्यंग्य – मानवाधिकार, ट्रैफिक और कबीर कौ साँचौ

 घुटरू आजकल के लोग’न कों है का गयौ है? इनके अधिकार तौ इन्हें पतौ हैं परन्तु जैसें ही कर्तव्य की बात करौ तौ बगल झाँकते भए घर की घटिया चढ जामें! इन्हें का मिलनों चैंयें यै बतायवे वारे तौ भौतेरे हैं मगर इन्हें करनों का चैंयें वौ न तौ ये जानें! न बतायवे वारे ही इनके पास हैं! लेना बैंक ऑन देना बैंक गॉन!

 बत्तो आज तू कैसें सेंटी है गयी? का बात है?

 

का बताओं घुटरू कछू दिन’न सों मानवाधिकार वारी पोस्टन की संख्या कछू जादा ही बढ़ गयी है, जिन्हें नाँय पतौ वे हू मानवाधिकार की जयजयकार कर रहे हैं! अच्छा तू ही बताय का होवै है मानवाधिकार?

 

बत्तो, मेरी समझ के अनुसार जा’हू जीवात्मा नें या नश्वर जगत में जनम लियौ वाकों पूर्ण गरिमा के संग जीवे कौ अधिकार मिलै. सबरे जीव बराबर होंय. सबकों सामान अवसर मिलें. संसाधनन पै सबकौ बराबर अधिकार होय. सबकों शिक्षा, सबकों चिकित्सा, सबकों सुरक्षा मिलै. सबकी सिकायत सुनी जाएं. सबकी समस्यान के समाधान होंय. कहूँ कोऊ असमानता होनी ही नाँय चैंयें; आदि आदि इत्यादि.

 

अच्छा अब यै बताय, ऐसौ होवै है का? मोय तौ नाँय लगै कि अपुन सबन्ह कों अपने मूलभूत अधिकार मिले होंय! बल्कि मैं तौ कभू-कभू सोचों कि दिनरात मानवाधिकार की पींपनी बजायवे वारेन कों यै सब दिखाई पर हू रह्यौ है कि नाँय?

 

अब यै बात छोड़ बत्तो, तैंनें वौ कहावत तौ सुनी ही होयगी कि समरथ कौ नहिं दोस गुसाईं!

 

हाँ सुनी तौ है मगर या किस्सा में वाकौ का मतलब?

 

है, मतलब है बत्तो. काहू देस में दो समुदाय’न के बीच के कलेस में तौ मानवाधिकार वारे कूद सकें मगर दो देस’न के बीच की मूछ’न की लड़ाई में जो सहर के सहर ध्वस्त है रहे हैं, सभ्यता समूल नष्ट है रही हैं; यै सब मानवाधिकार वारेन कों वैसें ही नाँय दिखाई परै जैसें कि सहर के मैन चौराहे कौ ट्रैफिक और वाकौ कारन पूरे सहर कों भलें ही दिखतौ होय; मगर सासन-प्रसासन वारे’न कों नाँय दिखै मतलब नाँय ही दिखै!

 

बात तौ तेरी सही है घुटरू! मन में एक प्रश्न और है कि लोगबाग गूँगे क्यों है गये हैं? अवाज क्यों नाँय उठामें?

 

सीधी सी बात है बत्तो, सूरदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान जैसे तौ हू कभूकभार मिल जामें परन्तु कबीर तौ बस एक ही भयौ सो भयौ; वाके बाद तौ कबीराई कौ साँचौ ही खोय गयौ!

 

बड़ी झीनी सी चादर है, उधड़ जाती है अक्सर ही

इसे हर दौर में अच्छे जुलाहों की जरूरत है

 

नवीन सी चतुर्वेदी

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