ब्रजभाषा व्यंग्य – कबूतर कबूतरी’न की पार्टी

 रोज ही करती हैं एलाने-सहर

ओस की बूँदें मुलायम घास पर

बाग तो ढेरों हैं मेरे शहर में

बस वहाँ पंछी नहीं आते नजर

 

घुटरू गयौ तब तौ बड़ौ लपकौ लपकौ गयौ हुतो आते समें उदास उदास क्यों है? का बात है गुरूजी नें कछू कह दियौ है का?

 

नाँय बत्तो गुरूजी तौ मिले ही नाँय वे कबूतर कबूतरी’न की पार्टी में गये भये हैं।

 

कबूतर कबूतरी’न की पार्टी? गुरूजी ते यै उम्मीद नाँय नी। कबूतर कबूतरी’न की पार्टी में गुरूजी कौ का काम? कहाँ गुरूजी और कहाँ पब कल्चर? न कपड़ा’न कौ होस न बात’न कौ, यहाँ तक कि लोग रिस्ते-नाते तक भूल जाते होंय ऐसी जगें क्यों गये गुरूजी?

 

बत्तो तेरौ नाम बत्तो यों ही नाँय रखौ गयौ। तिल कौ ताड़ बनायवे में माहिर है तू।

 

अच्छा मतलब पब कल्चर वारी पार्टी में नाँय गये। वैसें आजकल तौ पॉलिटिकल पार्टी’न में हू कबूतर कबूतरी भरे परे हैं। नेता लोग हू हैं तौ इन्सान ही। पॉलिटिकल जगत कों हू कॉर्पोरेट कल्चर अपनानों परौ है। ये लोग हू नाच गाने खायवे पीवे घूमवे फिरवे के प्रोग्राम करते रहें। है सकै गुरूजी काहु संस्कारवादी पार्टी के उदारवादी कार्यक्रम में गये होंय।

 

आज तैंनें ठीक सों विचार न करवे की कसम खाय रखी है का बत्तो? कछू भी बोलें जाय रही है।

 

ओके ओके तब तौ गुरूजी काहु साहित्यिक कार्यक्रम में ही गये होंगे। साहित्यिक लोग हू कोउ कम रंगीले थोरें ई होमें? भेस भूसा गरीब’न जैसी रखंगे मगर सराब महँगी ते महँगी पियंगे। चिरैया चिरोंटा वारे किस्सा तौ रूटीन है। कभू कभू मानसरोवर और हंस हंसिनी वारी कहानी हू सुनवे कों मिल जामें। लोग बतामें कि एक स्तरीय कवयित्री के सकल साहित्य की चर्चा सों दस बीस बल्कि सौ गुनी जादा सोहरत वाके लोटन कबूतर वारे गाने कों मिली। चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पै लोटन कबूतर रे। है सकै गुरूजी साहित्यिक कबूतर कबूतरी’न सों मिलवे गये होंय।

 

बत्तो गुरूजी गोआ गये हैं। तू गोआ कौ नाम सुन कें फिर कछू उलटौ सीधौ मत सोचवे लगियो। तेरे जैसे लोग गोआ कों कारण विशेष सों ही याद करें। लोग’न कों पतौ नाँय नें कि भारत में पक्षी’न की कुल प्रजाति’न की चालीस प्रतिशत सों अधिक प्रजाति अकेली गोआ में ही हैं। न केवल अपने देस बल्कि विदेस के हु अनेक पक्षी’न की प्रजाति वहाँ देखवे कों मिलें। और जादा जानकारी चैंयें तौ गूगल कर लै।

 

खुदा का शुक्र है सूरज नहीं हैं हम वरना

न जाने कितने परिन्दों के पर जला देते

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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