दूर के रिश्तेदार के छोरा की बरात हुती। बन-ठन कें अपुन बरात में जैमे निकसे। रस्ता में घुटरूमल जी मिले। इनकी हु
वहाँ रिश्तेदारी है सो हमनें पूछी चल नाँय रहे, फलाने के
बेटा की बरात जैमे? साब घुटरूमल जी तौ ऐसें भड़के जैसें काहु नें साँड़ कों लाल कपड़ा
दिखाय दियौ होय।
बोले, ये बरात हैं? इनते जैमों
कहें? बरात नाँय ये तौ पढ़े-लिखे लोग’न के चोचले हैं। अरे
जैमे तौ हम जैं चुके, अब कहाँ वौ बात! कहते-कहते घुटरूमल जी सेंटी है गये। बोले अहा कैसौ बढ़िया समौ हुतो, पट्टी बिछाय कें, पानी के छींटा मार कें, पातर धरीं जातीं। माटी के कुल्ला और सकोरा। एक-एक कर
कें परसैया आते। लैन लगाय कें। पूरी, कचौरी, सोंठ, नमकीन, पतरौ साग,
सूखौ साग, तरह-तरह की मिठाई,
रबड़ी, दही-बड़ा और जाकी
जैसी श्रद्धा। परसैया एक-एक कर कें आते, पातर’न पै सामग्री धरते जाते। फिर कोउ बड़ौ-बुजुर्ग
जयकारौ लगवातो तब बराती भोजन करते। याके बाद भैया लेउ-लेउ और
बस्स-बस्स। मनुहार कर-कर कें खवाते। कहूँ-कहूँ तिलक कर कें दक्षिणा हु दीनी जातीं। अब तौ गिफ्ट के नाम पै लिफाफे
में धर कें उलटी दैनी और परै। अब कहाँ वौ बात।
अब तौ जैसें मन्दिर’न के बहार खीचरी लैवे वारे’न की लैन
लगें, ऐसें लोग प्लेट लैवे के लिएं लैन लगामें।
हालाँकि पुराने जमाने में जैसें मुन्सिपलिटी की नल और राशन की दुकान’न पै एकजनों नम्बर लगातो और चार-चार
घुस जाते वैसें ही बुफे की लैन में हु दो जने’न के बीच में चार-छै घुस ही जामें। पढ़-लिख गये तौ का आदमी तौ आदमी है
नें साब, आदत तौ वे ही हैं। यै तौ हु गनीमत है, रोटी की स्टॉल कौ नजारौ और हू विचित्र। जैसें ही तन्दूरी नान, रोटी’न के दस टुकड़ा ट्रे में आमें, लोग विनपै ऐसें
झपटें जैसें कि अकालग्रस्त क्षेत्र में हेलीकॉप्टर सों खायवे के पैकेट बरसे होंय। कभू-कभू तौ ऐसौ लगै जैसें जिमायवे
वारे नें बस उधार चुकाय दियौ होय। आउ, खाउ और जाउ। आउ-आदर जैसी कोउ बात ही नाँय रही अब।
हमें लगौ घुटरूमल जी थोरे जादा ही सेंटी है रहे हैं सो विषय
बदलते भए पूछी चों साब हमनें सुनी है अगले साल आपकी हू छोरी कौ ब्याह है। आप पातर वारी बरात करौगे या बुफे वारी? घुटरूमल जी झेंपत भए बोले गुरूजी
मेरी इच्छा तौ पातर वारी की है परन्तु का करों घर वारे नाँय मान रहे। हमनें कही
घुटरूमल जी आप जैसे लोग’न के लिएं ही तुलसीदास जी कह गये हैं - पर उपदेस कुसल बहुतेरे। वैसें आपकी यै बात तो सही है कि आउ-आदर तौ होनों ही चैंयें। जय राम जी की।
नवीन सी. चतुर्वेदी
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