ब्रजभाषा व्यंग्य – जागो मोहन प्यारे जागो

 बत्तो सोवै कि जागै?

 घुटरू दिन के सात बजे रहे हैं, यै कोउ सोयवे कौ टैम है जो पूछ रह्यौ है सोवै कि जागै?

 

भेंन यै बात मत कह, दिन के सात की का बात कह रही है? बाजे-बाजे लोग तौ कहौ तौ नौ बजे पै हु न उठें!

 

अरे घुटरू जिन लोग’न की लेटनाइट ड्यूटी होवै है जैसें कि अखबार वारे’न कों ही लै-लै, जो बिचारे घर ही आधी रात के बाद पहोंच रहे हैं वे जल्दी कैसें उठ सकें?

 

बत्तो लेट घर पहोंचवे वारे’न की छोड़, ऐसे-ऐसे हू बीर-बाँकुरे हैं जिन्हें पसरवे सों फुरसत नाँय नें मगर जबतक झिंझोड़ कें जगायौ न जाय, बिचारे उठ नाँय पामें! बिल्कुल आम आदमी की तरें! जबतक पानी सिर के ऊपर सों गुजर नाँय जावै, तन्नौआ तान कें सोते ही रहें! अब देख चुनाव आय रहे हैं! वे ही लोग जो तरें-तरें की घुट्टी पिबाय कें जनता कों गहरी नींद में सुवाय राखें हैं, वे ही घण्टा-घड़ियाल बजाय कें जगामंगे और चिल्लाय-चिल्लाय कें कहंगे जागो मोहन प्यारे जागो!

 

हाँ घुटरू तू सही कह रह्यौ है जो हमें अफीम चटाय कें घैर घुप्प नींद में सुवाय राखें हैं, चुनाव आते ही सिगरे के सिगरे बजमारे देवी के जागरण करवायवे लगें हैं। चुनाव खतम और बात खतम! हारवे वारे ताने मारें कि आपने वोट दिया होता तो हम जीतते और जीतते तो वादे निभाते, अब आपने जिसको वोट दिया है उसके पास जाओ!

 

और बत्तो जो जीत जामें हैं वे बिचारे पहलें तौ ढोल खडकवामें हैं फिर वा ढोल पै नाचें हैं विनके संग वारे हू नाचें हैं। जैसें कि बताय रहे होंय कि देखौ अब पाँच साल ऐसे ही ढोल खड़कने हैं और आप सभी को ऐसे ही नाचना है! ॐ जय जगदीश हरे के घोष के साथ आरती उतारने को हमारी आर्मी है ही!

 

घुटरू सच में कितनी दयनीय दशा है गयी है न आम आदमी की! या मारें ही तौ दुनिया भर में जेन जी सड़क’न पै उतरन लगी है। तैंनें देखी नाँय कित्ती जगें तख्ता पलट है गये?

 

बत्तो जेन जी जागृत भयी है यै हु देखौ, तख्ता पलट भये वौ हु देखौ और विन तख्ता पलट’न के बाद जेन जी की किंकर्तव्यविमूढ़ वारी दशा हू देख रयौ हों!

 

घुटरू मैं समझी नाँय?

 

समझ में आते हैं कुछ इन्कलाब आहिस्ता आहिस्ता

करें भी क्या कि खुलते हैं सराब (मृगतृष्णा) आहिस्ता आहिस्ता

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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