ब्रजभाषा व्यंग्य – सायरी नये जमाने की

घटरूमल जी आज बड़े ही सायराना अन्दाज में बोले गुरूजी चलौ आज नये जमाने की सायरी सुन आमें। हमारी प्रश्नवाचक-मुद्रा भाँप कें बोले, आज ढपोलसंख-हॉल में एक कार्यक्रम है “एक साम बेगम नस्तर और मामा कनस्तरी के नाम”। हम हू बैठें-बैठें बोर है रहे हुते, सोची चलौ सुन आमें। हॉल फुल्लम-फुल्ल पैक। सबसों पहलें बेगम नस्तर माइक पै आईं और बोलीं

 

तलाक दे तो रहे हो इताबो कहर के साथ

तलाक दे तो रहे हो इताबो कहर के साथ

ध्यान रखना मेरी दोस्ती है सारे सहर के साथ

 

लोग’न नें जानें का समझौ भगवान जानें, हमें तौ बस वाह-वाह वाह-वाह ही सुनाई परी। बेगम नस्तर आगें बोलीं

 

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

ये चूल्हा, दूध, आग, माचिस कुच्छौ काम के नहीं

मैं चूल्हा जलाती हूँ तभी दूध में उबाल आता है

 

फिर सों वौ ही वाह-वाह वाह-वाह। हम वा घड़ी कों कोसन लगे जब घुटरूमल जी की बात मान कें यहाँ आय फसे। अब मामा कनस्तरी जी कौ नम्बर आयौ। आते ही फरमाए 

 

हरेक बात पै कहते हो तुम कि तू क्या है

हरेक बात पै कहते हो तुम कि तू क्या है

हमने यू पी बिहार में बनाये पुल

और उत्तराखण्ड की बाढ़ में बहा डाले 

हमारे सामने बंगाल का जादू क्या है

 

हम जब तक सोचें कि हँसें कि रोमें वा सों पहलें ही मामा कनस्तरी जी फिर सों उवाचे मतबल बोले

 

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

धरती से आसमान तक, चीन से जापान तक

सारी फसादों की जड़ एक घोड़ा और एक घोड़ी है

 

मन में तौ आयौ कि कहें वाह-वाह वाह-वाह क्या छोड़ी है। परन्तु भैया बड़े-सियाने कह गये हैं जब मूरख’न के बीच में फँस जाऔ तौ मौन रहवे में ही भलाई है। जैसें तैसें प्रोग्राम खतम भयौ। घुटरूमल जी बोले आजकल ये दौनों खूब डिमाण्ड में हैं, अगले सण्डे फिर सों इन कौ प्रोग्राम है, आप कहौ तौ फिर चलें? हमनें कही प्रभु आप नें नये जमाने की सायरी सुनवाय कें आज तौ सच्चऊँ हमारौ दिल इत्तौ भर दियौ है कि इंच भर हु जगें नाँय बची। नेंक जगें खाली होय तब बतामें। जय राम जी की।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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