ब्रजभाषा व्यंग्य – बेमौसम बरसात

 घुटरू अपुन बचपन में सुनों करते कि बम्बई की बरसात का भरोसा नहीं करने का कभी भी आ सकती है। परन्तु अब तौ भैया पूरी दुनिया में ही ऐसौ है गयौ है कि बरसात कभी भी आ सकती है। बरसात का अब तौ आँधी तूफान हू रोज के से आमन लगे हैं! मगर घुटरू यै समझ में नाँय आय रही कि मौसम बेईमान कैसें है गयौ?

 बत्तो बेईमान मौसम नाँय भयौ, अपुन भये हैं, पहलें हमनें कुदरत के संग मनमानी करी अब कुदरत हमारे संग मनमानी कर रही है! हमनें बरगद काट कें कैक्टस उगाये! कुदरती पहाड़’न कों काट कें इमारत’न के पहाड़ खड़े कर दिये!  झील’न कों पाट कें कॉलोनी बसाईं और जंगल’न कों होटल बनाय दियौ! यानी जो करनों हुतो वौ न कर कें जो नाँय करनों हुतो वौ कियौ! मतबल तत्व सन्तुलन कों अक्षरशः ॐ स्वाहा कर दियौ! वाके बाद यै न होय तौ और का होय? वैसें या बेमौसम बरसात कौ एक फायदा जरूर भयौ है बत्तो, बरसात के नाम की छुट्टी जो पहलें केवल तीन चार महीना’न में ही लीनी जातीं वे अब साल भर लीनी जाय सकें।

 हाँ घुटरू यों तौ बरसाती ठेकेदार हू अपने ठेका साल भर चलाय सकें। जो काम चौमासे में नाँय भये या यों कहौ कि नाँय किये विनके टेंडर फिर सों पास करवाये जाय सकें। बहाने’न कों तरसते नेता हू अब नये बहाने बनाय सकें और भैया रही बात पब्लिक की, वौ बिचारी मोबाइल सों बाहर निकरै तब तौ कछू देखै, सोचै और समझै!

 बत्तो नैंक वा किसान की हू सोच जो या विडम्बना कौ ‘स्थायी पात्र’ बन कें रह गयौ है। कोठी बँगला में नाँय झोंपड़ी में रहवे वारे किसान की सोच!  करोड़’न में खेलवे वारे नाँय आज हू रोड पै रखड़वे वारे किसान की सोच! BMW में चलवे वारे की नाँय आज हू टूटी सायकल कों तरसवे वारे किसान की सोच! वौ बिचारौ जब बुवाई करै तौ आसमान सूखौ रहै और जब कटाई कौ समय आवै तौ बिन बुलाये मेहमान की तरें बदरा घिर आमें!

  साँची कह रह्यौ है घुटरू, यै बेमौसम बरसात बिन बुलाये मेहमान की तरें आवै सो तौ आवै, जाते जाते यों और कह जावै

 सूखा, बाढ़, अकाल का, समझ सकें यदि मर्म

नियति नियन्ता नीतिगत, निभा रहे हैं धर्म

निभा रहे हैं धर्म, ध्येय भी बता  रहे हैं

तत्व-सन्तुलन ज्ञान-संहिता पढ़ा रहे हैं

क्लीयर है सन्देश भले ही स्वर है रूखा

कुम्भकर्ण यदि बने झेलना होगा सूखा

 नवीन सी. चतुर्वेदी

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