घुटरू मेला’न के अपने मजा हैं। तोय याद है अपुन बचपन में नहाय-धोय कें नये-नये कपड़ा पहर कें नाचते-कूदते मेला’न में जाउ करते। तेरी मैया तौ यै मौटौ-मौटौ काजर हू लगाती तेरी आँख’न में।
घुटरू तैंनें हू का बिसय बदल
दियौ याद है अपुन कैसे झूला झूलते।
हाँ बत्तो झूला और रहट’न में
बैठवे कौ अपनों मजा होतो और कित्ते कम पैसा में! आजकल के अम्यूजमेंट पार्क वारे तौ
लूट रहे हैं। तब के झूला और रहट वारे पैसा तौ कम लेते ही मगर ऐसें झुलाते जैसें अपने
खुद्द के बाल-बच्चा’न कों झुलाय रहे होंय। अब तौ का कम्पनी
वारे और का सरकार वारे सब के सब ऐसे झूला झुलाय रहे हैं कि पूछौ ही मत। सच्चऊँ अपुन
लोग आखिरी पीढ़ी हैं जो स्वर्ग कौ आनन्द लूट चुके।
हाँ घुटरू तू सच्ची कह रयौ है।
अपुन मेला में कठपुतली कौ खेला हू देखते। तब कहाँ पतौ हुती कि आयवे वारे समय में अर्थव्यवस्था
भलें ही वर्ल्ड क्लास है जावैगी मगर अपुन लोग’न की दसा कठपुतली’न सों हू बदतर है जावैगी।
और बत्तो कैसे रंग-बिरंगे गुब्बारे’न सों खेलते अपुन! अब तौ ठीक सों याद हू नाँय आवै कि एक गुब्बारौ
कितने पैसा कौ आतो! कछू गुब्बारे अपुन फूँक भर कें फुलाते कछू फूले-फुलाये मिलते। कछू अपुन अपने संग वारे’न सों फुलवाते। फिर कैसें अपुन ही पिन
चुभाय कें विन गुब्बारे’न की हवा हू निकार देउ करते। यानी अपुन ही फुलाते और अपुन ही
हवा हू निकार देते।
सही कह रयौ है घुटरू वा समय के
आदमी’न कों आदमी’न की भूख हुती। धरती पै बैठ कें खाते, धरती पै सोते सो पाम हू धरती पै ही रहते, हवा में नाँय
उड़ते गुब्बारे’न की तरें। आज के आदमी कों तौ पतौ तक नाँय रहै कि वाय गुब्बारौ बनाय
कें कौन हवा भर रयौ है। हवा निकसवे के बाद आसमान सों धरती पै आवै तब होस आवै।
क्यों गुमान करतौ रहै, काहें गाल फुलात
रे मानुस मत भूल, तू, गुब्बारे की जात
नवीन सी. चतुर्वेदी
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