ब्रजभाषा व्यंग्य – ब्लू ड्रम वारी रील

कंधा पै गमछा डारें घुटरूमल जी पधारे और आते ही विनकौ लाउडस्पीकर चालू है गयौ। गुरूजी पतौ है आजकल कौन सी रील ट्रेंड कर रही है? तुम का जानों? तुमें तुमारे मिसरा, सुकला’न सों फुरसत मिलै तब तौ जानौगे?

जो न जानते होंय वे जान लेंय कि गजल में शेर होमें और शेर की दौनों पंक्ति मिसरा कहलामें। मिसरा यानि वाक्य। असल में हम जब कभू गजल के काहु मिसरा की बुनावट में उलझ कें रह जाते तौ हमारी घरवारी बोल परती अरे सुन नाँय रहे, फिर सों काहु मिसरा, सुकला के चक्कर में फँस गये हौ का? एक दिना घुटरूमल जी सुन गये तब सों वे हु या डायलॉग कों मारन लगे हैं। घुटरूमल जी आगें बोले पतौ है आजकल ब्लू कलर वारे प्लास्टिक के ड्राम’न की रील ट्रेंड कर रही हैं? हम समझ गये कि ये मेरठ हत्याकाण्ड की बात कर रहे हैं। वे आगें बोले गुरूजी जाय देखौ वौ ही ब्लू कलर वारे ड्रम्स की रील बनाय बनाय कें डार रयौ है। सोश्यल मीडिया वारे हु ऐसी रील’न कों खूब घुमाय रहे हैं। बजार कौ का है वाय तौ टर्न ओवर सों मतलब रहै। काहु जमाने में पण्डित’न के लिएं कह्यौ जातो भलें जियौ भलें मरौ पण्डित जी कौ पेट भरौ। पण्डित बिचारे तौ कब के सुधर चुके मगर आज के इन आधुनिक तथाकथित पण्डित’न कौ गिरेबान पकरवे की हिम्मत काऊ माई के लाल में होय ऐसौ दीखै तौ नाँय नें। घुटरूमल जी तौ बोलते ही गये बोलते ही गये मगर हम तौ जैसें संज्ञा शून्य है चुके हुते। सुनाई परवौ ही बन्द है गयौ हुतो। दिमाग में केवल ब्लू ड्रम ही घूमन लगे। आदमी ऐसौ हैवान है सकै? आदमी नें आदमी के काट काट कें टुकड़ा कर दिये? ड्रम में दफन कर दियौ आदमी कों? मन में अनेक झंझावात उठन लगे। बार बार एक ही वाक्य टंकोर मारन लग्यौ, हाय हम इतने सम्वेदना शून्य है गये? काहु के बेटा काहु के भैया काहु के बाप के शरीर के टुकड़ा टुकड़ा कर दिये गये और ऐसे विषय की राष्ट्रीय स्तर पै सामूहिक भर्त्सना करिवे की जगें हम लाफ्टर की रील बनाय बनाय कें डार रहे हैं, शेयर कर रहे हैं, देख रहे हैं, देख देख कें मगराय रहे हैं! हाय, हम सच में सम्वेदना शून्य है गये हैं!!! अट्टहास की दीवानी भीड़ सों और उम्मीद करी हू का जाय सकै! हे प्रभु इन सम्वेदना शून्य व्यक्ति’न कों क्षमा कर दै।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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