घुटरूमल जी बोले बड़े साल’न बाद आये हौ चलौ तीन वन की परकम्मा दै आमें। दिवारी के बाद देवोत्थान एकादशी के दिन तीन वन की परकम्मा लगै। मथुरा, गरुण-गोविन्द और वृन्दावन इन तीन वन’न की परकम्मा।
हमनें पूछी घुटरूमल जी मथुरा वृन्दावन तौ अब स्मार्ट सिटी जैसे है गये फिर नाम तीन वन की परकम्मा क्यों? वे बोले गुरूजी नाम में का रखौ है! अगर काहु पार्टी कौ नाम सत्यवादी पार्टी होय तौ वाकौ सत्यवादी हैवौ जरूरी थोरें ई होवै। सब्द’न पै नाँय भावना’न पै ध्यान देउ।
खैर, हम परकम्मा दैवे निकसे। जैसें ही हमनें वृन्दावन की सीमा में प्रवेश कियौ
घुटरूमल जी नें सचेत कियौ गुरूजी वृन्दावन आय गयौ नेंक बन्दर’न सों बचते भए। हमनें
कही भैया आप तौ ऐसें कह रहे हौ जैसें हम परदेसी होंय! बन्दर
तौ अपनी मथुरा में हु हैं। वे बोले मथुरा के बन्दर अलग और वृन्दावन के अलग। हमनें पूछी
कैसें?
बोले, मथुरा के बन्दर संतोसी-ब्राह्मण जैसे हैं, पेट खाली रहै तभी तक घुर्रामें, पेट भर जाय तौ कहूँ
एकान्त में जाय कें अराम फरमान लगें। किन्तु वृन्दावन वारे एकदम प्रोफेशनल, बाकायदा ट्रेनिंग मिली होय ऐसौ लगै। इनकौ डर ऐसौ है कि ये तौ खुले में
घूम रहे हैं और लोगबाग घर’न में पिंजरा की तरें रहवे कों मजबूर। यै ही हालत रही तौ
वौ दिन दूर नाँय जब लोग पिंजरा में बन्द है कें बाहर निकसौ करंगे!
काऊ जिम्नास्टिक प्लेयर की
तरें आपके चस्मा पै झपट्टा मार कें बगल की बिल्डिंग पै चढ़ जामें मगर नजर’न सों ओझल
नाँय होमें। धमकाऊ नेता’न की तरें डरामें परन्तु चस्मा पकरें रहें। प्रोफेसनल
नेगोशिएटर की तरें। जब तक फ्रूटी या बिस्किट नहीं मिलै तब तक चस्मा नहीं छोड़ें। अनशन-आन्दोलन वारे’न कों हु मात करें ऐसे अद्भुत हैं ये वृन्दावन के बन्दर।
इतनों ही नाँय बन्दर’न के
लिएं फ्रूटी फेंकवे वारे हु फुल्ली एक्सपर्ट। इनके आगें पोलिटिकल-एजेण्ट हू पानी भरें। फ्रूटी कब-कहाँ-कैसें फेंकनी है इनते सीखौ। कभू-कभू ऐसौ हु लगै
जैसें ये बन्दर’न की भासा जानते होंय। जब कोउ बन्दर काहु तगड़ी पैसा वारी पार्टी कौ
पर्स लै जाय तब पहलें तौ ये वा पार्टी सों पर्स छुड़ायवे की अपनी फीस तय करें फिर
फ्रूटी-बिस्किट ऐसें फेंकें कि बन्दर के हाथ में ही न आवै।
या तरें ये अपनी फीस के सँग-सँग चार-पाँच
फ्रूटी-बिस्किट’न के एक्स्ट्रा पैकेट हु जेब में धर लेमें।
गुरूजी या ही मारें कही
मथुरा के बन्दर अलग और वृन्दावन वारे अलग। समझदार कों इसारौ काफी होवै। समझौ तौ
समझौ नहीं तौ जय राम जी की।
नवीन सी. चतुर्वेदी
No comments:
Post a Comment