ब्रजभाषा व्यंग्य – लहरिया रोड

 सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी

चोट खाकर भी शराफत कर रहे हैं आदमी

 

बत्तो अपनी सरकार और वाके मंत्री सच्चऊँ स्मार्ट हैं। जमानों है हू स्मार्ट’न कौ। स्मार्ट होनों ही चैंयें। नयी परिभाषा के अनुसार जो स्मार्ट है वौ अगड़ा और जो स्मार्ट नाँय नें वौ पिछड़ा कहलावै।

 

घुटरू पहेली मत बुझाय। खुल कें बोल। काहु कौ डर है का? सच्ची बात कहवे में डर कैसौ?

 

नाँय बत्तो डर कैसौ? अपुन ब्रजवासी तौ कृष्ण कों हू “द्वै बाप’न वारौ” कह चुके हैं।

 

घुटरू ब्रजवासी छोड़, अवध और मिथिला वारे हू कम नाँय नें। “एक भाई काला और एक भाई गोरा बता दे बबुआ” के माध्यम सों राम कों हू लपेट चुके हैं। मगर एक बात है घुटरू, वा जमाने में लोग आलोचना सुन लेते। अबकी तरें नाँय कि बोलवे वारे की बोलती ही बन्द कर दीनी जाय।

 

बत्तो तेरी बात है तौ सत्य, किन्तु आंशिक। पहलें लोग’न की टीका-टिप्पणी पूर्वाग्रह सों ग्रस्त नाँय होतीं। चित्त में तुच्छ और क्षणिक स्वार्थ नाँय होतो। मुख्य उद्देश्य या तौ जन-जागरण होतो या जन-मन-रंजन। अपवाद छोड़ देंय तौ माहौल खुसनुमा रहतो।

 

खैर छोड़, मुद्दा की बात पै आ। सरकार और मंत्री’न की स्मार्टनैस के बारे में तू का कहनों चाह रह्यौ है?

 

विशेष तौ कछू नाँय बस एक निरीक्षण है जो तोसों बतरानों चाह रह्यौ हुतो। एक जमाने में डामर के रोड बनों करते। हर साल टूटते हर साल बनते। पब्लिक भलें ही परेसान होती परन्तु अनेक लोग’न के पेट पालते वे डामर वारे रोड। फिर खर्चा बचायवे के लिएं महँगे सीमेण्टेड रोड बनवे लगे।

 

घुटरू तू मुद्दा की बात पै आय रह्यौ है कि मैं जाओं?

 

बत्तो सरकार लोग’न सों कह-कह कें हार गयी कि गाड़ी की स्पीड अस्सी सों नीचें रखौ मगर लोग मानें ही नाँय नें। या मारें सरकार नें सीमेंटेड रोड जो पहलें समतल होते अब विनें हु अ-समतल बनवायवौ आरम्भ कर दियौ है। मतलब लहरिया वारे रोड। यहाँ स्पीड बढ़ी वहाँ गाड़ी उछरी।  अब दौड़ाऔ गाड़ी। अंजर-पंजर तौ ढीले  होमंगे ही मुसाफिर’न के मूड़ फूटंगे सो अलग। झक मार कें अस्सी छोड़ साठ के नीचें गाड़ी चलानी परें अब। है नें अपनी सरकार और वाके मंत्री स्मार्ट!

 

घुटरू मगर मैंनें तौ सुनी कि रोड पै चलती कार में कॉफी पियंगे और कॉफी छलक गयी तौ ठेकेदार ते पैसा वसूल किये जामंगे।

 

हाँ बत्तो सुनी तो मैं नें हू हुती। मगर बोलै कौन?

 

हुजूरे-वालिया हमरी जुबान मत सिलिए

हमारी खामुशी नुकसानों तक पहुँचती है

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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