ब्रजभाषा व्यंग्य – उठती गिरती रेटिंग

 बोल बचनों को सदाचार समझ लेते हैं

लोग टीलों को भी कुहसार समझ लेते हैं

 

घुटरू पहली लाइन कौ अर्थ तौ समझ गयी कि आजकल लफ्फाज’न कों सदाचारी समझ लियौ जावै। मगर दूसरी कौ अर्थ नाँय समझी। टीलौ तौ छोटी-मोटी पहाड़ी ते कहें मगर कुहसार काय सों कहें यै नाँय मलुम !

 

बत्तो तैंनें वौ कहानी तौ सुनी ही होयगी कि हमारे पास कोहिनूर हीरा हुतो जाय अंग्रेज चुराय कें लै गये। पहली बात तौ यै कि वासों कोहिनूर नाँय कोहे-नूर कहें। कोह प्लस ए प्लस नूर। नूर कौ कोह। कोह यानि परबत, नूर यानि प्रकाश; कोहे-नूर यानि प्रकाशपुंज। जैसें एक कौ बहुवचन अनेक, वैसें ही कोह कौ बहुवचन कुहसार। दूसरी लाइन कौ मतबल भयौ कि छोटी-मोटी पहाड़ी यानि टीले जैसे’न कों हु लोग परबत जैसे समझ लेमें हैं।

 

अच्छा अब समझी। सही कही भैया आजकल तौ नाम बड़े और दरसन छोटे वारे लोग’न कौ ही जमानों है। जहाँ देखौ वहाँ ऊँची दुकान फीके पकवान वारे सीन ही दिख रहे हैं। लेकिन घुटरू ऊँची दुकान’न के फीके पकवान बिक कैसें जामें?

 

बत्तो यामें कौन बड़ी बात है? मार्केटिंग के दम पै पच्चीस पचास रुपैया किलो के कोलतार में कैमिकल मिलाय कें पाँच हजार रुपैया किलो के रेट पै हु बेचौ जाय सकै। यै मार्केटिंग केवल वस्तू’न की ही नाँय आदमी, कम्पनी यहाँ तक कि देश’न की हू होवै है।

 

हाँ घुटरू याद आयौ जब अमेरिका में चुनाव है रहे हुते तौ कभू खबर आती कि ट्रम्प की रेटिंग बढ़ रही है और कभू आती कि ट्रम्प की रेटिंग गिरने लगी है। फिर अचानक सों खबर आती कि ट्रम्प की रेटिंग में सुधार हो रहा है। अब इतने अधिक प्रतिशत लोग ट्रम्प को पसन्द करते हैं। आदमी न भयौ शेयर बाजार कौ इण्डेक्स है गयौ।

 

बत्तो आदमी छोड़, कम्पनी हु छोड़ यहाँ तक कि बड़े-बड़े देश हु रेटिंग के मोहताज हैं। मूडी जैसी कम्पनी’न के जहाज इन देश’न के दम पै ही उड़ रहे हैं। नैंक रेटिंग बढ़ी कि दुनिया भर के इन्वेस्टर दौरे-दौरे आमें और नैंक रेटिंग गिरी कि वे ही इन्वेस्टर डूबते जहाज के चूहा-चुहिया बन जामें। यासों हु मजा की बात यै कि पब्लिक सब जानें तौ हु मूरख बनती रहै।

 

नाँय घुटरू पब्लिक और नारी दौनों’न कों कम न आँकियो। चामर की मात्र एक कनी देख कें बताय सकें कि भात बनवे में कित्ती देर है।

 

अपनी बातों का बतंगड़ न बनाओ साहब

सार, इक पल में, समझदार, समझ लेते हैं   

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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