का है रह्यौ है घुटरू. ब्यारू है गयी कि नाँय?
ठीक है, है लै तू
फ्रैस-व्रैस. मूड-मिजाज बनाय कें ही आरोगवे के आनन्द हैं, आजकल के बाल-बच्चा’न कों न जानें का है गयौ है, दौरते-दौरते खामें, भाजते-भाजते पीमें. घनेरी बार
तौ सोते-सोते ही चाय-कॉफी सुडुपें और बिस्कुट हू चटकाय लेमें हैं. जब देखौ तब
मोबाइल’न में ही घुसे रहें. ऐसौ जानें का है इन मोबाइल’न में?
यै गलत बात है बत्तो, अकेले बाल-बच्चा ही थोरें ही मोबाइल’न में घुसे रहें, आजकल तौ का साठा-पाठा और का सतरा-पिचतरा; का लोग और का लुगैया सिगरे
मोबाइल’न सों यों चिपके रहें मानों ये मोबाइल न भये ऑक्सीजन-सिलेंडर है गये! अब का
बताओं तोय इन बड़े-बूढ़े’न की, ये भलेमानुस छोरी’न के नाम की आई-डी बनाय कें पहलें तौ अपने दोस्त’न कों फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेज कें जोड़ लेमें फिर छोरी
बन कें विनसों चैटिंग करें और बाद में वा चैटिंग कों दूसरे यार-दोस्त’न कों दिखाय-दिखाय कें आनन्द लेमें हैं. साँची कहें कि बचपन के सरारती
बुढापे में हू सरारत सों बाज नाँय आवै. बन्दर भले ही बुड्ढा हो जाय, गुलाटी मारना
नहीं भूलता!
हाँ ऐसी कछू कहानी मैं नें
हू सुनी हैं घुटरू, खैर अपुन कों का! अपने काम सों काम!
हाँ सो तो है बत्तो, और बताय आज तैं नें का रसोई बनाई है!
मैं नें तौ आज डिफरेंट बनाई
है. रोज-रोज दार भात साग रोटी का खानी, आज तौ मैं
नें ठाकुरजी की पसन्द की रसोई बनाई है. कभू-कभू वाके मन की हू तौ होनी चेंयें. सो
आज मैं नें करकल्ले कौ साग, और हलके-हलके फुल्का बनाये हैं.
ठाकुरजी की आज यै ही इच्छा हुती सो यै ही बनायौ.
का कही तैं नें बत्तो, एक बार और कहियो?
हाँ घुटरू आज ठाकुरजी की
करकल्ले कौ साग और हलके-हलके फुलका आरोगवे की इच्छा हुती सो आज मैं नें ये ही
सिद्ध किये हैं.
बत्तो तैं नें जो राँधौ वौ
तौ मैं नें सुन और समझ हू लियौ, मेरौ फोकस तौ ‘ठाकुरजी
की इच्छा’ वारे वाक्य पै है. मन तौ अपनों चल रह्यौ है और नाम ठाकुरजी कौ! जीभ अपनी
ललचाय रही है और कह रहे हैं ठाकुर जी की इच्छा है! वाह भाई वाह! अगर सच में
ठाकुरजी भोग आरोगवे लगें तौ लोग भोग धरायवौ ही बन्द कर देमंगे! तेरे जैसे’न के लिएं ही कह्यौ जावै कि
दुनिया कैसी बावरी, कान्हा कों भरमाय
लडुआ वाय दिखाय कें, खुद्द हड़प कर जाय
नवीन सी चतुर्वेदी
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