जैसें टी वी रेडियो पै वार्ता आमें ऐसें ही एक मुहल्ला-ब्राण्ड-मोबाइल-चैनल वारौ घुटरूमल जी सों बघार के बारे में पूछवे आयौ। सर्वगुण-सम्पन्न घुटरूमल जी और विनके बीच के प्रश्न-उत्तर’न कौ आप हु आनन्द लेउ:
उत्तर. दाल-सब्जी-कढ़ी आदि कौ स्वाद-स्वरूप बढायवे के लिएं करी जायवे वारी प्रक्रिया सों बघार कह्यौ जावै।
सामान्यतः यह राई-मैथी, जीरौ, हींग, लोंग, घी, तेजपत्ता, दालचीनी, लालमिर्च,
कारीमिर्च आदि के भिन्न-भिन्न मिश्रण’न सों
तैयार कियौ जावै। या सों तड़का, छौंक, फोडणी,
वघार, धुँआर चटकारा आदि हु कहें। बघार पदार्थ
के संग-संग एक तत्व हू है। जीवन-दर्शन
में बघार के अनेकानेक स्वरूप चिन्हित किये जाय सकें। राजनीति में कौमन-मिनिमम-प्रोग्राम हु बघार कौ ही एक प्रकार है। कौमन-मिनिमम-प्रोग्राम नामक बघार सों ही मिलीजुली सरकार’न कौ स्वाद-स्वरूप बन्यौ रहै।
प्रश्न. याकी शुरुआत कब और कौन नें करी?
उत्तर. या प्रश्न कौ सटीक उत्तर दैनों कठिन है। अनुमान ऐसौ है कि आदम और हव्वा के
बीच सेव खायवे की जो लीला भयी हुती वा दौरान ही बघार नामक तत्व कौ प्रादुर्भाव भयौ
होयगौ। बिना चटकारा, भण्डारा थोड़े ही हुआ होगा भाई।
प्रश्न. याके बिना रसोई बन सकै?
उत्तर. बन तौ सकै मगर मरीज’न के जैसी बनैगी। न स्वाद, न रूप,
न रंग। दार-साग में तैरते भए बघार विहीन
पदार्थ वैसे ही लगें जैसें मलाईदार विभाग विहीन मंत्रीपद। मिलौ तौ का और न मिलौ तौ
का? स्वादहीन, गन्धहीन, दीन-मलीन नमकीन कों भला कौन चखनों चाहैगौ?
प्रश्न. अब के और पहले के बघार’न में का अन्तर है?
उत्तर. अब तुम पूछ रहे हौ तौ बतामें – अब के बघार’न में वौ
बात कहाँ? अजी मोहल्ला के पहले घर में बघार लगतो तौ आखिरी वारे घर तक खसबू
पहोंचती। क्या ही बढ़िया तौ छन्न-छनन-छन की अवाज आती जैसें बरसात की अवाज में घुँघरू’न
की अवाज मिल गयी होय; और भैया ऐसी अद्भुत सुगन्ध जैसें सुलगते-लोबान पै काहू नें केसर बुरक दीनी होय। अब तौ काऊ-काऊ
जगें या तरियाँ बघार लगें जैसें कि मोटर के पहिया की हवा निकस गयी होय। खैर यै
विषय भौत बड़ौ है और समय की हू सीमा है या मारें फुरसत में मिलियो और हु भौत सारी
बातें बतामंगे।
प्रश्न. सर जस्ट लास्ट क्वेश्चन। अंग्रेजी में बघार ते का कहें?
उत्तर. अंग्रेज’न के पुरखा’न नें उ बनाए कभू दार-झोर? जो
बघार लगाते? अरे लाले यै तौ अखण्ड-भारत की प्रचण्ड-उपलब्धि है, जाकों पिज्जा-बर्गर
खाय-खाय कें हमतुम ही खण्ड-बण्ड करें
जाय रहे हैं। समझ सकौ तौ समझौ नहीं तौ जय राम जी की।
नवीन सी. चतुर्वेदी
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