घुटरूमल जी बोले, गुरूजी याद करौ कछू समय पहलें एक फिल्मी गानों आयौ हुतो बीड़ी पी के नुक्कड़ पै वेट तेरा किया रे खाली पीली अठारह कप चाय भी तो पिया रे आदि आदि इत्यादि और लास्ट में एबीसीडी पढ़ ली बहुत अच्छी बात कर ली बहुत अब करूँगा तेरे साथ गंदी बात गंदी बात गंदी गंदी गंदी बात।
गुरूजी ऐसौ ही एक और हू गानों आयौ हुतो भाग डीके बोस डीके बोस डीके बोस डीके भाग। कमाल यै कि अश्लील गाने जब धार्मिक अनुष्ठान’न में बजें तब विरोध करवे वारे हू बोतल चढ़ाय कें नाचन लगें। गुरूजी पतौ है इन गाने’न के विरोध में इतनी चर्चा भईं कि जिन्हें पतौ नाँय हुतो विनकों हू पतौ चल गयौ कि बजार में नये चटाखेदार गाने आये भये हैं। बात कड़वी है मगर दिखावे के विरोध, विरोध कम और पब्लिसिटी जादा लगें।
आजकल अश्लीलता पै चर्चा चल
रही है। जिननें स्वयं संस्कृति और संस्कार’न कौ सूपड़ा साफ कर दियौ ऐसे लोग हू लेक्चर
पेल रहे हैं। तहजीब के तलाब की गंदी मछली जिन्हें कहें ऐसे-ऐसे लोग हू टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। गुरूजी सोसायटी और अश्लील बकैती कौ हमेशा सों चोली-दामन जैसौ संग रह्यौ है। याद करौ फगुआ, होरी और अपने
ब्याउ-बरात। कैसी-कैसी गारी दीनी
जातीं। कैसे-कैसे क्रियाकलाप’न के बारे में गाय-बजाय कें सुनायौ जातो। हाँ मगर ये नॉनवेज बातें औलाद अपने मैया-बाप के बारे में नाँय करतीं। सारी, सरेज, भौजाई अवश्य हास परिहास कौ विषय रहीं परन्तु गली मुहल्ला की भैन बेटी तक’न
कौ ध्यान रखौ जातो।
कामसूत्र में वर्णित
यौनक्रिया सों सुसज्जित डांस और दुःशासन के अट्टहास कों लजाते लाफ्टर तौ बजार परोस
ही रह्यौ है और सोसायटी हू इनकौ रसास्वादन कर रही है परन्तु सही गलत बात तौ अपने
बाल बच्च’न कों अपुन ही बतामंगे नें। बजार चॉकलेट बेचैगौ, नुकसान थोडें ही बतावैगौ।
गुरूजी जब सों समाज है तब
सों कोठा और तवायफ हू हैं। आदमी में शैतानियत जनम सों होवै, संस्कार सिखाये जामें। पहलें तवायफ’न के यहाँ कोउ बिरलौ ही जातो। मगर जब फिलम’न
में गाय, बजाय, सजाय कें तवायफ’न के लटका-झटका और ठौर-ठिकाने दिखाये जामन लगे तौ छोरी-छापरी मसक्कली और छोरा-छापरे छुट्टा साँड़ बन गये। घड़ी
भर के नैन सुख नें अच्छी खासी सोसायटी की वाट लगाय दीनी। गुरूजी विरोध तौ तभी
मानों जायगौ जब गन्दगी कों सिरे सों नकार दियौ जाय नहीं तौ कहवे वारे यै ही कहंगे
कि यै विरोध नाँय पब्लिसिटी है रही है।
नवीन सी. चतुर्वेदी
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