ब्रजभाषा व्यंग्य – अपने आप बजे दरबज्जे

 हो अटल विश्वास जिनको कायदे पर   

वे फिसल सकते नहीं हैं फायदे पर   

 

बत्तो तोय याद है बचपन में अखबार में एक खबर छपी हुती झुमरी तलैया के बारे में। एक सौ इक्यासी दरबज्जे’न वारी। जासों एक सौ इक्यासी परिवार प्रभावित भए हुते और जाकी पंचायत बरस’न तक चली हुती!

 

हाँ घुटरू याद आयी। मिलजुल कें रहवे वारी झुमरीतलैया के स्वर्णिम इतिहास में वौ घटना कारे धब्बा की तरें है। छोरा-छापरे थोरे-भौत बिप्लवी तौ होमें ही हैं। आठ-दस छोरा’न कौ एक झुण्ड हुतो। दिनभर मटरगस्ती करते। हँसी-मजाक हू करते। परन्तु काहू कौ दिल दुखै ऐसी हँसी-मजाक नाँय करते।

 

हाँ बत्तो अच्छे बुरे कौ ज्ञान हो विनें। फिर न जानें का भयौ गाम में कछू बाहर के लोग आये और ये गाम के छोरा विन की संगत में उठन-बैठन लगे। फिर अचानक एक रात कों गाम की गली-मुहल्ला’न में जोर-जोर सों दरबज्जे’न के बजवे की अवाज आयी। गामवारे इत्ती जोर की अवाज सुन कें घबराय गये। घर’न की बत्ती जर उठीं। लोग गली और बजार’न में निकस आये। सबके सब घबराये भए। या भागदौड़ में भौत’न के भौतेरे नुकसान हू है गये। भौत’न के तौ हाटफेल हू है गये। हाथ पाम तौ न जानें कितने’न के टूटे होमंगे।

 

हाँ घुटरू बाद में जब गिनती सुरू भई तौ पतौ चलौ एक सौ इक्यासी घर’न के दरबज्जे खड़काये गये वा रात कों और हर घर कों याके चलते नुकसान हू भयौ। घटना सबके सामनें भयी। नुकसान सबके सामनें सबकी नजर’न में हुतो। पंचायत बिठायी गयी और दूर-दूर के गाम वारे’न नें हू या घटना की घोर-निन्दा करी। हर तरफ सों एक ही अवाज आयी। इन्साफ होना चाहिए।

 

हाँ बत्तो बाद में यै हू सुनी कि कछू बेकसूर लोग’न कों या मामले में फसाय दियौ गयौ। बाद में यै हू सुनी बेकसूर’न के संग कसूरवार’न कों हु छोड़ दियौ गयौ। पूरौ मैटर ही गड्ड-मड्ड है गयौ। तरें-तरें के बहस-मुबाहिसे, तरें-तरें की दलील, तरें-तरें के धरना-आन्दोलन सब चलते रहे और या सबरे घटनाक्रम कों एक सौ इक्यासी प्रभावित परिवार मूकदर्शक बन कें देखत रहे। फिर एकदिन अचानक खबर आयी “चूँकि कोई पुख्ता सबूत नहीं मिल पायौ है या मारें काहू कों कसूरवार नाँय ठहरायौ जाय सकै, सबको बरी किया जाता है”। मतबल वे एक सौ इक्यासी दरबज्जे काहू नें बजाये नाँय ने। अपने आप बजे हुते। है सकै हवा बजाय गयी होय! मगर बत्तो, लोग चूक थोरें ही सकें, पंचायत कौ फैसला आते ही पब्लिक नें अपनों फैसला सुनाय दियौ

 

अब करेगा कौन कारोबार तुमसे

टिक नहीं पाते हो अपने वायदे पर

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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