चला मुरारी हीरो बनने – ब्रजभाषा व्यंग्य

देखौ साब, फिर मत कहियो कि बतायी नाँय नीं। स्पष्ट शब्द’न में कह रहे हैं। काहु सों डरें थोरें ही हैं। खलकत में यानी चौरे में कह रहे हैं। एक जैसे चेहरा मोहरा वारे लोग होमें नाँय नें का। बात यै है कि यै अमेरिका वारे ट्रम्प की कहानी नाँय नें।

हमनें बचपन में एक कहानी सुनी हुती। चौंक काहे रहे हौ, कहानी बचपन में ही तौ सुनी जामें हैं। बाद में तौ चार लोग’न के सँग बैठवे, बोलवे, बतरायवे की फुरसत ही कहाँ मिलै है। कहानी है झुमरीतलैया की। अब यै मत पूछियो कि यै झुमरीतलैया है कहाँ? कहूँ होय, अपुन कों का? अगर काल्पनिक जगें है तौ होउ करै।  वैसें काल्पनिक जगें ही होनी चैंयें, तभी तौ आजतक याकौ नाम बदलौ नाँय गयौ।  तौ साब झुमरीतलैया में मुरारीलाल नाम के एक सज्जन रहौ करते। चेहरा ट्रम्प के जैसौ ही। बचपन सों ही हीरो बनवे कौ जबरदस्त सौक। जैसें ही कहूँ मौकौ देखते, विनके सरीर में दिलीप कुमार सों लै कें अमिताभ बच्चन तक की आत्मा घुस जाती। अब यै अलग बात है कि बिचारे हर बार हीरो की जगें विलेन बन जाते। साब  विनके मुहल्ला में ब्याउ बरात की सामग्री बन रही हुती। इतनों बढ़िया इंतजाम कि बिना सोरसराबे के सबरे काम सिस्टमेटिकली चल रहे हुते। ये पहुँचे, चारौ तरफ नजर घुमायी, सोची आउ भगत होयगी। मगर साब काहु नें ढंग सों देखौ तक नाँय। फिर सोची कि कछू काम ही कर लियौ जाय। अब विनके करबे लायक कोउ काम होतो तौ करते।  अब का करें। अचानक ही विनके भीतर शक्ति कपूर की आत्मा घुस गयी। खुराफात सूझवे लगी। देखी एक तबेला में रायतौ रखौ भयौ है। आउ देखी न ताउ। एक झटका में सिगरौ रायतौ फैलाय मारौ। फैलायौ सो फैलायौ, चिल्लायवे हु लगे कि रायता फैल गया, रायता फैल गया। फिर खुद ही समेटवे हु लगे। साब क्या बतामें, रायते कों समेटवे में पसीना पसीना है गये। विनें लगी अब तौ कोउ जरूर कहैगौ कि वाह मुरारीलाल जी, क्या समेटा है। मगर भैया विनकी किस्मत में हीरो नाँय विलेन बनवौ लिखौ भयौ है।  ताड़ने वाले कयामत की नजर रखते हैं। एक आदमी आय कें विनके कान में बोलौ जब समेटना ही था तो फैलाया ही क्यों? समेटने को तो बहुत कुछ है। अरे लाला और कुछ नहीं तो अपने आप को ही समेट ले।


 बोझ उठता ही नहीं हमसे पराये गम का
हम तो बस अपने ही विस्तार सम्हाले हुए हैं

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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