बुद्धि कौ सदुपयोग – ब्रजभाषा व्यंग्य

 सही कहें कि एक जनम में सात जनम है जामें हैं! एक जीवन में हजार अनुभव है जामें हैं! याद आमें पुराने दिन, कैसी तल्लीनता सों अखबार पढ़े जाते! पन्ना बाँट-बाँट कें पढ़े जाते! खबर’न पै चर्चा होतीं! अब तौ यै हालत है कि “बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ ग’इ है रफ्तार। पाँच मिनट में पढ़ लेते हैं दस पन्नों वाला अखबार।।“

 वौ समय अलग हुतो, खबर या तौ अखबार’न सों मिलती या टीवी-रेडियो सों! यै सोश्यल-मीडिया कौ जमानों है! सबके पास अपनों अखबार है! जब-जो चाहौ, छापौ! पाठक और वा’में हू गम्भीर पाठक की कमी सों तौ बड़े-बड़े अखबार हू जूझ रहे हैं, या विषय पै मौन रहवौ ही ठीक है! मजे की बात यै कि हर आदमी अपने कीमती समय कों फोकट में जुकरबर्ग और मस्क जैसे’न की झोली में डारें जाय रह्यौ है! अपने स्वास्थ्य की आहुति दै कें विनकी तिजोरी भर रह्यौ है! जब आदमी स्वयं भेड़ बन ही गयौ है तौ भैया भेड़ पै ऊन कौन छोड़ैगौ? जिनके हाथ जितनों लग रयौ है, सब काटें जाय रहे हैं!

 

कभू-कभू लगै - मोबाइल न चलामें तौ का करें? दिन भर हाथ पै हाथ धरें बैठे रहें का? फिर यों हु लगै - मोबाइल चलायवे वारे हू तौ हाथ पै हाथ धरें ही बैठे भए हैं! जब मोबाइल आयौ नाँय हुतो तब अपुन का करौ करते? वौ जीवन, जीवन हुतो कि यै जीवन, जीवन है? तब तौ सात महौल्ला पार की हू खबर रहती! अब पास बैठे आदमी तक की खबर नाँय रहै! सूझ ही नाँय रह्यौ कि का बरबाद है रह्यौ है! बुद्धिजीवी’न सों हू कहा उम्मीद रखें? जब जामवन्त गरजा, हनुमत में जोश जागा! हमको जगाने वाले, लोरी सुना रहे हैं!

 

डिवलपमेंट सों परहेज नाँय नें! डिवलपमेंट नें ही तौ पहाड़न में सों पहिया बनाये, जिनके दम पै आज मनुष्य ब्रह्माण्ड की सैर कर रह्यौ है! मगर, एक तौ पक्षी हैं जो आकास भर घूम कें अपने घोंसला में लौट आमें है और एक अपुन लोग हैं कि हवा में उड़ें ही जाय रहे हैं! पाम धरती पै रखवे कों तैयार ही नाँय नें; और जब सोचें कि ऐसौ है क्यों रह्यौ है? तौ एक ही उत्तर मिलै - ऐसौ या मारें है रह्यौ है कि आज कौ इन्सान अपने आर्यभट्ट जैसे पूर्वज’न की तरें बुद्धि कौ सदुपयोग करवौ भूल गयौ है!

 

हम वही हैं ‘शून्य’ खोजा था जिन्होंने

अब इशारे तक समझ पाते नहीं हैं

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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