ब्रजभाषा व्यंग्य – अवॉर्ड सेरेमनी

 चाय पीते भए अखबार के पन्ना पलटे तौ एक फुल पेज कौ विज्ञापन दिखाई परौ अवॉर्ड सेरेमनी। आयोजक की जगें घुटरूमल जी कौ नाम।

पढ़ते ही दिमाग में प्रश्न आयौ घुटरूमल जी अवॉर्ड सेरेमनी कर रहे हैं? अवॉर्ड दैवे वारे हैं? जो व्यक्ति बाई डिफॉल्ट  पराई जेब कों ईश्वर प्रदत्त अवॉर्ड समझतौ होय वौ व्यक्ति दूसरे व्यक्ति’न कों अवॉर्ड दै रयौ है! वौ हू अखबार में विज्ञापन निकार कें! यै बात हजम भई तौ हमनें घुटरूमल जी कों बुलवायौ और पूछी कि प्रभु सच्ची-सच्ची बताऔ यै कौन सी नयी लीला रची जाय रही है?

 

घुटरूमल जी सोफा पै पसरते भए बोले गुरूजी आपकों याद होयगौ एक जमाने में देस भर सों लोग हीरो-हीरोइन बनवे के लिएं बम्बई आऔ करते। विनी दिन की बात है झुमरीतलैया सों छीनू झपटू नाम के दो दोस्त मुम्बई आये। बिचारे’न नें भौत हाथ पाँय मारे। मगर मजाल है कि मुकद्दर पसीजौ होय! ये बिचारे हीरो बनवौ तौ दूर एक्स्ट्रा हू बन पाये।गर गुरूजी दौनों भौत ही चुस्त, चंट, चलाक। इननें देखी कि बॉलीवुड में काम करवे वारे के लिएं अनेक’न काम हैं। जो लोग हीरो-हीरोइन बन कें भजिया नाँय खाय पामें वे भजिया तलवे वारे तौ बन ही जामें।

 

बस यै आइडिया आते ही ये फिल्मी कंसल्टेंट बन गए। गालिब के नाम ते मसहूर मिसरा  बिना ढूँढे हजारों मिलते हैंके अनुसार बकरा खुद हलाल हैवे इनके पास आमन लगे। कछू एजेण्ट हू इन लोग’न सों जुड़ गये। साब इनके जहाज रेत पै दौड़वे लगे बकरा-बकरी कों फाँस कें फिलम बनामें अब आप समझ सकौ ऐसी फिलम का चलती होमंगी सो भागते भूत की लँगोटी भलीकी तर्ज पै हम ते विन बकरा-बकरी’न कों पुरस्कार दिबवामें। सब कछु तय हू ये ही करें। हम तौ बस कठपुतली की तरें हाथ पाँय हिलाते रहें और साब हम का हाथ पाम हिलामंगे, डोरी तौ इनके हाथ रहै जैसें जैसें ये घुमावें हम वैसें वैसें घूमते रहें। वैसें गुरूजी सच्ची झूठी तौ नाँय मालुम मगर हमनें सुनी तौ यै हु है कि अपने देस में कठपुतली जैसे लोग सरकार हू चलाय चुके हैं। खैर अपुन कों का?

 

हमनें पूछी घुटरूमल जी काहु दिन तुमारी पोल खुल गयी तौ? वे बोले गुरूजी अपने देस में लोकतंत्र है। जहाँ चोर कों चोर साबित करवे में साहूकार की चप्पल घिस जाती होंय वहाँ हमारी पोल खोल कें काहु कों का मिलैगौ? या मारें फिकर छोड़ कें हमारे संग जयकारौ लगाऔ बोलो सत्य नारायण भगवान की जय।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

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