जब कर दई तौ रात की सत्ता पै हैरानी ऐ चों
घुटरूमल आज भोर सों ही आय गये। हमेसा खिले-खिले रहवे वारे घुटरूमल आज कछू उदास-उदास हुते। एक हाथ में कागज और दूसरे में पैन। हम माजरौ समझ न पाये। थोरी देर इन्तजार कियौ जब देखी कछू बोल ही नाँय रहे तौ पूछनी परी का बात है प्रभु? क्यों उखड़े-उखड़े से लग रहे हौ? हमारौ इत्तौ पूछवौ हुतो कि बस, एकदम सों फट परे।
गुरूजी कल छोरा के स्कूल गयौ हुतो छुट्टी
की अर्जी लगायवे। मास्टरनी नें मूड कौ सत्यानास कर दियौ। हमें लगौ इननें कछू लीला कर दीनी होयगी मगर वैसौ नाँय कछू और ही बानक बन्यौ। आगें बोले जैसें ही हमनें अर्जी वाकी मेज पै रखी वौ तौ हमें ऐसें देखन लगी जैसें
काहु परग्रहवासी कों देख रही होय। बोली हम आपके बच्चे को ई फॉर एलिफेंट सिखाने
के लिए दिनरात मेहनत कर रहे हैं और आप उसकी लीव एप्लिकेशन हिंदी में लिख कर लाये हो! जाओ इंग्लिश में लिखकर लाओ। आपको न आती हो तो किसी से लिखवाकर लाओ।
हमनें पूछी घुटरूमल जी समस्या का है स्कूल
वारे इंग्लिश में अर्जी माँग रहे हैं तौ आप इंग्लिश में लिख कें दै देउ। आप कों न आती होय तौ मैं लिख देंउ। बोले या मारें ही तौ आयौ हों, आप ही लिख कें देउ। मगर गुरूजी यै है तौ गलत। हिंदी हिंदुस्तान में ही उपेक्षा कौ सिकार
है रही है! घुटरूमल जी की बात के बीच में ही बत्तोरानी
कूद परीं। बोलीं गुरूजी मेरे संग अलग ही घटना घटी।
मैंनें एक सरकारी विभाग में अंग्रेजी में
कम्प्लेन लिख कें दीनी तौ वे बोले कि अंग्रेजी में नहीं हिंदी में सिकायत लिख के लाओ। गुरूजी मैं नें हिंदी में सिकायत लिख कें दै तौ दीनी मगर तब सों लगातार सोच रही
हों कि सिकायत तौ आयातित सब्द है। सिकायत सों हिंदी में का कहें? भारत में सिकायत के आयवे सों पहलें हु तौ
लोग सिकायत करते होंगे, तौ वे का करते होंगे? हमनें एक सब्द कों पूरी तरह भुलाय दियौ! और यै काम काहु विदेसी आक्रान्ता नें नाँय
कियौ, स्वयं सामूहिक रूप सों हम सबनें मिल कें
कियौ है।
घुटरूमल और बत्तो रानी दौनों’न की बात सुन कें हमनें सोची उत्तर देंय
मगर चुप रहे।
बेहतर है ढूँढें और हम बरतें सलीक़े से उन्हें
हर शब्द को हर दौर में अपनी कहानी चाहिए
नवीन सी.
चतुर्वेदी
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