जैसें ही गाड़ी निकारी सामनें मुंसीपाल्टी की गाड़ी
और वाके संग भौत सारे लोग दिखाई परे! हमनें सोची, नाली-नाले’न में भौत गन्दगी
भरी परी है, सायद वाकों साफ करवे आये होंगे! फिर सोची अभी तौ
बरसात भौत दूर है, इत्ती जल्दी काम थोरें ही करौ जावै! असुविधा
फैलवे के बाद सुविधा दैवे कों सुसासन कह्यौ जावै है! नाँय-नाँय
ये गन्दगी साफ करवे नाँय आये हैं! तौ क्यों आये हैं?
हम सोच ही रहे हुते कि नजर फुटपाथ पै परी! साग-भाजी फल-फूल वारे अपने-अपने समान’न कों इधर-विधर खिसकाय रहे हुते! एक बोलौ – फोन आया था, दस बजे आयेंगे मगर नौ बजे ही आ गये, दस पर आते तो नुकसान
बच जाता! दूसरौ बोलौ – साल में दस बार आते हैं, सामान ले जाते हैं, कुछ दिन के बाद वापस सब वैसे का वैसा
ही! अगर वापस वैसे का वैसा ही करना होता है तो ऐसा करते ही क्यों हैं? तीसरौ बोलौ कि
अरे यार मार्च एंडिंग है, टारगेट कम्पलीट करना होगा! चौथौ बोलौ
नहीं यार सिस्टम अब बदल गया है! इस बार जो मैडम आयी हैं, बहुत
ही स्ट्रिक्ट हैं, उन्होंने प्रण लिया है कि जो अब तक नहीं हुआ
उसे कर के दिखायेंगी!
हमनें
सोची ये लोग सेंटी है रहे हैं! ये का जानें इत्ती बड़ी व्यवस्था कोउ ऐसें ही चल सकै?
कछू न करौ तौ दुखी और करौ तौ हु दुखी! पब्लिक भौत ही इमपेशेंट है गयी है! यै सब सोचते
भए हम हायवे पै आय गये! गाड़ी हायवे पै अवश्य आय गयी मगर चल रही हुती वैसें ही जैसें
गाम के दगरे में बैलगाड़ी चल रही होय! और वातावरण की तौ साब पूछौ ही मत! ध्वनि-प्रदूषण के संग-संग भयंकर अवस्था कों प्राप्त है चुकौ वायु-प्रदूषण!
बम्बई की वर्तमान दसा कों देखते भए लगै कि वाकई दिल्ली भौत दूर नाँय नें! खैर, जो सबकी दसा सो अपनी दसा! आगें बढ़े साब! अचानक ही हमें ट्राफिक-हवलदार नें रोकौ और कागज-पत्तर दिखायवे कों कही। हमनें
डॉक्युमेंट्स दिखाय दिए! मगर साब वौ कहें नें कि कमी ढूँढने वारे
कों कमी मिल ही जावै है सो विन साब कों हू मिल गयी! हमें घूर कें बोले पीयूसी कहाँ
है? यै सुनते ही पहलें तौ हमनें सड़क और इमारत’न की कृपा सों चारौ तरफ फैले भये प्रदूषण
कों महसूस कियौ फिर अपनी गाड़ी के एक्सपायर है चुके पीयूसी सर्टिफिकेट कों देखौ और मन
ही मन यै सेर पढ़ मारौ
किसी
भी दृष्टि में हूँ ही कहाँ मैं
मेरा
होना मेरा होना नहीं है
नवीन
सी. चतुर्वेदी
No comments:
Post a Comment