तो अपनी बस्तियों को स्वर्ग सा सुन्दर बना लेते
बत्तो, समझ में आयी या समझानों परैगौ?
यै का बात भई घुटरू? तू का समझै नारी
में बुद्धि नाँय नें? भूल मत पहली गुरू मैया ही होवै है। सब सों पहलें ए फॉर एप्पल
मैया ही सिखावै है। जामें आजकल की मैया तौ सुपर मॉम बन चुकी हैं। हर मामले में तैयार
बल्कि कहूँ-कहूँ तौ आगें। कम समझवे की भूल मत करियो। तू जो पूछ रह्यौ है कि मकान और
घर में का अन्तर है तौ लाला सुन या अन्तर कों हम लुगैया’न सों बेहतर कौन समझ सकै? तुम
पुरूष लोग जो मकान खरीदौ या बनवाऔ विन ईंट-पत्थर के ढाँचे’न
कों घर हम लुगैया ही तौ बनामें।
अरी बत्तो तू तौ सेंटी है गयी। जैसें
शक्ति बिना शिव अधूरे वैसें ही नारी बिना नर अधूरौ, या में कोउ दो राय नाँय नें। मगर यै
बताय अगर मकान कों घर लुगैया बनामें तौ अब मकान घर जैसे क्यों नाँय लग रहे? मैं
दोस नाँय दै रह्यौ बस समझनों चाह रह्यौ हों।
घुटरू जैसें नारी बिना नर अधूरे
वैसें ही नर बिना नारी अधूरी। दौनों’न कों गाड़ी के दो पहिया यों ही थोरें ही कह्यौ
जावै। नारी मकान कों घर तब बनातीं जब मर्द-मांस हू घर की जवाबदारी’न में हाथ बटाऔ
करते। आजकल जवाबदारी के नाम पै किचन के काम बँट जामें बस। इतनों सौ ही काम होवै का
घर में? कपड़ा, बासन, रोटी आदि कों तौ चाकर
मिल जामें। असली चुनौती है संस्कार, संस्कृति, रीति-रिवाज, अच्छे-बुरे की पहचान आदि-आदि। ये सबरे काम अकेली लुगैया
कैसें कर सकें और कब तक कर सकें?
बत्तो तोय का लगै मर्द-मांस इन सब बात’न कों
नाँय जानें? नाँय समझें? अरे सामाजिक मूल्य’न के ह्रास ते प्रभावित हम लोग हू तौ
भये हैं। जिन्दगी की रेल बन गयी है। न ढंग की नींद मिल पावै न चैन सों दिन गुजर
पावै। अपने गाँव-कस्बा’न में जो आनन्द, जो हिलोर, जो किलोल कर लीनी सो कर लीनी, अब तौ बस सपने हैं। ऐसौ लगै जैसें किस्त चुकायवे कों ही पैदा भये होंय।
हाँ घुटरू जीवन की सन्ध्या में अब
समझ आयी है कि जहाँ पैदा भये, पले, बढ़े, पढ़े-लिखे, अवसर तौ वहाँ हू खूब हुते। बस हमें ही भागवे
की परी जो जड़’न सों दूर है गये। साँच ही तौ कहें
हमें अपने इलाकों से मुहब्बत हो नहीं
पायी
वगरना जिन्दगी को और भी बेहतर बना
लेते
नवीन सी.
चतुर्वेदी
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