वैसें हम हैं तौ बिसुद्ध फेसबुकिया परन्तु आप हमें
अफीमची की उपाधि सों नवाज सकौ। का बतामें साब रोज सवेरें उठ कें “कराग्रे वसते
लक्ष्मी“ कौ पाठ करवे वारे हम अब उठते ही मोबाइल ढूँढ कें फेसबुक चैक करवे लगे
हैं।
हर पाँच मिनट में हाथ ऑटोमैटिकली मोबाइल कों ढूँढवे लगै। हमें याद है जब नये-नये फेसबुकिया बने हुते तब ढूँढ-ढूँढ कें लोग’न कों फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजौ करते। डॉक्टर की दवा की तरें
एक सुबह एक शाम, दै दनादन कविता हू पोस्ट करौ करते। छाँट-छाँट कें लोग’न कों टैग करौ करते। तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ कौ
ध्यान धर कें दिनभर लाइक और कॉमेंट हू करौ करते। तब पतौ नाँय नी कि “बोया पेड़ बबूल
का आम कहाँ से पाय” वारी कहावत एक दिन हम पै हू लागू होयगी। का बतामें साब कैसे-कैसे लोग’न की फ्रेंड रिक्वेस्ट आमन लगी हैं। हम ठहरे कवि, इसारे में समझायौ हू कि भैया “घूँघट की आड़ से दिलबर का दीदार अधूरा रहता
है” मगर कोउ समझै तब नें। नैंक ठीकठाक से दीखवे वारे की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट
कर हू लेउ तौ रोज की गुडमॉर्निंग गुडनाईट चालू है जावै। और तौ और भौतेरे तौ
मेसेंजर में लखनवी नवाब बनवे सों हू बाज नाँय आमें। भौतेरी ऐसे-ऐसे फोटू’न के संग दरसन देमें हैं जैसें कह रही होंय “विश्वामित्र के
बच्चे अब तू गया काम से”। का करें साब। यै सब कम होय सो ऐसे-ऐसे टैगेश्वर प्रकट है गये हैं जो एक ही पोस्ट कों बीस ग्रुप’न में चिपेकें
और बीस-बीस बार टैग कर देमें हैं। या सों हू बड़ी ताज्जुब की
बात यै कि इन भले आदमी’न कों टैग करवे के समय तौ हमारौ नाम याद रहै, मगर मजाल है कभू हमारी पोस्ट पढ़ते होंय। वा समय इनें हमारौ नाम याद नाँय
आवै। अगर कभू पूछ लेउ साब आपको हमारी पोस्ट नहीं दिखती क्या? तौ बड़ी ही मासूमियत
सों जवाब देमें “सॉरी मुझे ये फेसबुक थोड़ा कम समझ में आता है।“ अब इनसों कौन पूछै
कि आप जो दिनभर टैग करते रहौ वौ आपकी तरफ सों जुकरबर्ग कर रयौ है का? और सबसों जादा
मजे की बात, बस काहू महिला कों डीपी बदलन देउ, बड़े-बड़े साधू जैसे लोग मजनू कों मात करवे लगें।
उस को जन्नत की हूर बतला कर
दिल का कमरा vacant कर बैठे
ऐसी D. P. लगाई
लैला ने
सारे मजनूँ comment कर बैठे
नवीन सी. चतुर्वेदी
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