पापी पेट नाँय जिब्बो रानी है – ब्रजभाषा व्यंग्य

यामें चामर का खसखस भर हू संसय नाँय नें कि हास-परिहास सर्वश्रेष्ठ औषधि है। आप सोच रहे होउगे कि हमनें खसखस और चामर कौ जिकर क्यों करौ है?

आमतौर पै तोला, मासा, रत्ती आदि कौ जिकर कियौ जावै है; हम नयौ राग क्यों अलाप रहे हैं? तौ भैया वाकौ सीधौ सौ कारन बस्स यै है कि

  लाजिम है ढूँढें, ढूँढकर बरतें सलीके से उन्हें।

 हर लफ्ज को हर दौर में अपनी कहानी चाहिए।
 
 रत्ती शब्द तौ भौतेरे लोग’न नें सुनों होयगौ, मगर याकी माप सबकों नाँय मलुम। 8 दाने खसखस के यानी चामर कौ एक दानों और 8 दाने चामर के यानी एक रत्ती। तौ भैया हमनें रत्ती के बेटा नाँय बल्कि नाती की बात करी है। हास-परिहास के विषय में हमें रत्ती के नाती बराबर हू संसय नाँय नें। किन्तु यै हू परमावश्यक है कि कभू-कभार हास-परिहास के अतिरिक्त हू सोचनों चैंयें।
 
लोग अक्सर कहें कि “क्या करें साब, पापी पेट का सवाल है!” अब यै सोचवे की बात है कि नाँय? एक बात बताउ साब, का सच्चऊँ पेट, पापी है सकै? जाकी जरूरत फिक्स है कि एक सीमा के बाद अफरा है ही जानों है, वौ कर-कर कें हू कितने पाप कर लेयगौ? कहूँ तौ रुकैगौ! कभू तौ रुकैगौ! मोय नाँय लगै कि सवाल पापी पेट कौ होवै है। बल्कि सवाल तौ जिब्बो रानी यानी हमारी जीभ कौ है।
 
दुनिया कौ हर झंझट जीभ के चटखारे की है दैन है। कुदरत नें जा अंग कों ग्राह्य और अग्राह्य के भेद के लिएं बनायौ हुतो हम वा अंग कों हवस कौ पर्याय बनाते जाय रहे हैं। जब पेट की भूख सान्त है जावै वाके बाद, वे आदमजात जो अबतक मनुष्य नाँय बन पाये हैं, जिब्बो रानी विनके सिर पै सवार है कें, अपनी गन्दगी चारों तरफ फैलायवे लगै है। तभी तौ पैंसठ साल कौ हैवान तीन साल की बालिका संग अनाचार करै है! अरब’न-खरब’न के मालिक गरीब की जेब पै निगाह गड़ाएं रखें हैं! सर्वोच्च पद पै पहोंच कें हू बाजे-बाजे बजमारे नीच हरकत कर बैठें हैं! आदि आदि इत्यादि।
 
भैया, पापी पेट नाँय नें, पापी तौ हमारी जिब्बो रानी यानी जीभ है, जो केवल म्हों ही नाँय सरीर में अनेक जगें अवस्थित है और जोकि उत्तरोत्तर संसार की हवस कों बढ़ाती ही जाय रही है
 
यह चटोरी जीभ ही भरमा रही है हम सभी को
पेट भरने के लिए तो पाव भर आटा बहुत है
 
नवीन सी. चतुर्वेदी

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