फिर वा के बाद एक दिन हमनें सुनी कि दारू पै बंदिस के खिलाफ दारू के प्रेमि’न के प्रेमि’न नें जोरदारी सों अवाज उठायी कि दारू पै बंदिस लगाना सरासर गलत है. दलील दीनी गयी कि इससे तो ये मैसेज जाता है कि पूना वाले लोग दारूडिये हैं, इसलिए इसको तत्काल प्रभाव से केंसिल किया जाय. फिर भैया वाके बाद एक दिन सुनी कि दारू पै बंदिस गलत है ऐसौ मानते भये बंदिस हटाय दीनी गयी. बंदिस हटवे सों दुखी तौ कछू एक ही भये होंगे मगर हाँ खुस भौत सारे भये होंगे. वैसें ही जैसें कोरोना के दिन’न में सरकार द्वारा दारू की दुकान खुल्वे कौ ऐलान होते ही करोड़’न बुझे चेहरा खिल उठे हुते. हम सोच रहे हैं कि बंदिस लगायवौ फिजूल मानों जाय या लगी भयी बंदिस कों हटायवौ फिजूल मानों जाय? कछू समझ में आय नाँय रह्यौ, आप समझ पाउ तौ बतइयो.
भौत अजीब है यै दुनिया. हमें
याद है कि हमारे बचपन में यानि जस्ट चालीस पैंतालिस साल पहलें स्कूल जानों कितनों
महत्वपूर्ण काम होउ करतो. क्लास में बैठते ही कैसे अटेंशन में आय जाते. गुरूजी के
क्लास में पदार्पण करते ही सब के सब छात्र कोपी कलम के संग गुरूजी की बताई बात’न कों कोपी में उतारवे के लिएं तैयार है जाते. क्लास में बैठनों यानि
समृद्ध होनों. पिन ड्राप साइलेंस के संग क्लास चलौ करतीं. फिर कछू साल’न में ही हमनें देखौ कि ऐसे ऐसे गुरूजी’न की भरती होमन लगीं जिनकौ ध्यान
पढ़ायवे की जगें ट्यूशन चलायवे पै केन्द्रित होमन लगौ. और अब तौ यै हालत है कि अगर
कोचिंग क्लास ज्वाइन करे बिना दार गरै ही नाँय नें. जा क्लास में बैठवे के लिएं
गलाकाट स्पर्धा के अतिरिक्त लाख’न के खर्चा हू करने परें
वाके बाद हू वौ क्लास औचित्य विहीन सिद्ध होवै है. यानि फिजूल साबित होवै है. अरे
भैया जहाँ जायवे के बाद कोचिंग क्लास’न में हू जानों ही परै
वहाँ जानों तौ फिजूल ही भयौ नें!
क्लास में पूछता है इक बच्चा
मैम! मतलब फुजूल का क्या है
नवीन सी. चतुर्वेदी
No comments:
Post a Comment